राजनांदगांव | शिविर प्रारंभ पूर्व शनि मंदिर खैरागढ़ धरमपुरा में २४ घंटे की हवन आहुति की गई जिसका जनकल्याण था । हवन की पूर्णहूति पूज्य गुरूदेव अरविंद श्रीमाली के द्वारा किया गया ।
२ फरवरी को शिविर प्रारंभ के पूर्व पूज्य गुरूदेव के स्वागत सत्कार के लिए अमलीपारा में गुरूदेव का स्वागत किया गया पश्चात रैलीनुमा में जय गुरूदेव के जयकारे के साथ गुरूदेव के गाड़ी के पीछे कुशल पैलेस आयोजन स्थल पहुँचे। जहाँ हजारों की संख्या में जिले भर से आये गुरू भाई बहन इंतजार कर रहे थे।
कार्यक्रम के प्रांरभ में गुरू वंदना और वंदना के साथ हुई तत्पश्चात् स्थानीय व अन्यत्र स्थल से पधारे गुरू भाई-बहने त्रिशक्ति साधना शिविर के आरंभ में पादुका पूजन के बाद हुई । तत्पश्चात् भजन भक्ति प्रारंभ हुआ । शिविर के भजनों से शिव के माहौल को गुरूमय कर दिया । साधक-साधिकाऐं थिरकने अपने आप को रोक नही पाए । इस दौरान पूज्य गुरूदेव ने कहा कि यदि हमने मानव के रूप जन्म लिया है, तो हम दुखी क्यों है, ये दुख समाप्त क्यों नही होते और हम तुलना करते है हम असंतुष्ट क्यों है, प्रत्येक मनुष्य के मन में उठता है, हम केवल ऊपरी आवरण  को देखते है, किन्तु उनके जीवन को करीब से नही देखा है उनके जीवन में किसी प्रकार की संतुष्टि नही है, उनके परिवार में पारिवारिक भावना नही है हम सोचते है।
जिस मनुष्य के जीवन में धर्म नही होता तब तक उसके जीवन में हानि होती है, जीवंत पर्यन्त वह भगता रहता है । इस जीवन में कोई आस्था नही होता तो जीवन डगमगा जाता है । व्यक्ति अपने जीवन में दो प्रकार से जीवन जीता है । आस्था और बुद्धि । बुद्धि के माध्यम से हम अपने जीवन में थोड़ा बहुत जीवन यापन कर सकते है । जो जीवन में आस्था रखते है उन्हें आध्यात्मिक चेतना प्राप्त होती है, उन्होने आगे कहा कि विश्वास नही है आस्था नही तो उनका जीवन श्रेष्ठ नही होगा । जितना अधिक हम मंत्रो में तीण्र्यों में विश्वास रखते है, उतना ही अधिक हमें श्रेष्ठ होते है । जिस प्रकार से आदमी बीमार है तो एक गोली खाने से ठीक हो जाता है, किन्तु वह अधिक गोली १० गोली खा लेता है । तो रियेक्शन कर देता है, ठीक उसी प्रकार मंत्र के माध्यम से हमें ईश्वर प्राप्त होता है ।
सदगुरू हमें ज्ञान देना चाहे, चेतना देना चाहे तो उसे लेने के लिए शिष्य में समर्पण के भाव होना चाहिये 7 हमारे रोग-रोग मे चेतन्य जागृति के माध्यम से हमें पूर्णता मिलती है । ये हमारे शास्त्रो के माध्यम से हमें आगे बढऩा है । ये मंत्र, साधना, जप-तप है तो साधक को उच्चता की ओर ले जाता है । साधक अर्थात अपने जीवन को साधनेवाला ।
जिस प्रकार से हम गंगा नदी में डुबकी लगाते है तो हमें अलग तरह का ही अनुभव होता है, तो हमें अलग ही अनुभव होता है, हमें विश्वास है कि गंगा में नहाने से हम पवित्र हो जाएंगे । हमारे अंदर एक अलग ही विश्वास है हमारे अंदर एक अलग ही विश्वास है विश्वास और आस्था का एक उदाहरण देते हुए गुरूदेव नहा विश्वामित्र ने बिना कुछ किये सब कुछ प्राप्त हो जाए ऐसा सोचता है वह मूर्ख है । महाराज दशरथ से कहा कि राजकमारों को मुझे सौप दो, पूर्ण रूप से विश्वास करों कि मै इनका कल्याण करूंगा । सौपने का मतलब तन-मन से महाराज दशरथ ने अपने चारों मंत्रो को विश्वामित्रों को सौप देते है ।
चारों भाईयों ने पूर्णा समर्पण भाव से गुरू आशा का पालन किया । जिसका परिणाम राम मर्यादित पुरूषोत्तम के रूप में आज भी पूजे जाते है ।
मै अपने जीवन को जी सकता है, जीवन को साध सके वह साधु है जो कुदृष्टि रखते है, वह साधु नही है, ढोग है । प्रत्येक साधक अपने जीवन को साधना के माध्यम से मंत्र जप के माध्यम सेअपने जीवन को साधा वह साधक है ।
साधक कहता है मै अपने जीवन में देवत्व प्राप्त करना चाहता हूं, गुरू के प्रत्येक क्रिया को पूर्णा करना चाहता है । तत्पश्चात् गुरू दीक्षा का कार्यक्रम हुआ । नये साधक भाई-बहन को गुरूदेव ने गुरू दीक्षा दी । पश्चात्  पुराने साधकों को शक्तिपाथ दीक्षा दी गई । पश्चात् गुरूदेवको से समस्त साधक को त्रिशक्ति साधना करवाई । दीक्षा पश्चात् भजन आरती हुआ । पश्चात् सभी गुरू भाई-बहनों को गुरू प्रसादी को वितरण किया । इसी के साथ शिविर का समापन हुआ । कार्यक्रम में बड़ी संख्या में गुरू भाई-बहन उपस्थित हुए ।

By kgnews

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *