यूनियन कार्बाइड की राख में मरक्यूरी, हाईकोर्ट ने जताई चिंता, फेफड़े और दिमाग के लिए खतरनाक

जबलपुर 
 यूनियन कार्बाइड का जहरीला पीथमपुर में नष्ट किए जाने के बाद अब उसकी राख चिंता का विषय बनी हुई है. इस मामले में दायर एक अन्य याचिका की सुनवाई के दौरान बताया गया कि जहरीले कचरे से निकली 900 मीट्रिक टन राख में रेडियो एक्टिव पदार्थ सक्रिय हैं, जो चिंताजनक हैं. राख में मरक्यूरी है, जिसे नष्ट करने की तकनीक सिर्फ जपान व जर्मनी के पास है. ऐसे में इसकी घनी आबादी के पास लैंडफिलिंग करना भविष्य में खतरनाक साबित हो सकता है.

यूनियन कार्बाइड की राख को लेकर याचिका

साल 2004 में आलोक प्रताप सिंह ने यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे के विनष्टीकरण की मांग करते हुए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी. याचिकाकर्ता की मृत्यु के बाद हाईकोर्ट मामले की सुनवाई संज्ञान याचिका के रूप में कर रहा था. पूर्व में हुई सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से कचरे के विनष्टीकरण की रिपोर्ट पेश की गई, जिसके बाद हाईकोर्ट ने राख को घनी आबादी के पास लैंडफिल किए जाने पर रोक लगा दी थी. इसी दौरान एक अन्य याचिका दायर की गई, जिसमें राख को भविष्य के लिए खतरनाक बताया गया. इसके बाद हाईकोर्ट ने इस याचिका की सुनवाई मुख्य याचिका के साथ किए जाने के आदेश जारी किए थे.

राख को दूर ले जाने पर विचार करे सरकार

हाईकोर्ट जस्टिस अतुल श्रीधरन व जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने 8 अक्टूबर 2025 को जारी अपने आदेश में कहा था कि जहरीले कचरे की राख की लैंडफिलिंग के आदेश के बावजूद भी सरकार ने दूसरे स्थान के संबंध में जानकारी नहीं दी. सरकार द्वारा इंसानों की आबादी से सिर्फ 500 मीटर दूर लैंड फिलिंग का स्थान निर्धारित किया गया है. राख अभी भी जहरीली है और अगर इसे ठीक से नहीं रोका गया तो भूकंप जैसी किसी प्राकृतिक आपदा के कारण उसे रोकने वाला स्ट्रक्चर गिरने पर एक और आपदा हो सकती है. ऐसे में राज्य सरकार को राख ऐसी जगहों पर ले जाने की संभावना पर विचार करना चाहिए जो इंसानी बस्तियों, पेड़-पौधों और पानी के सोर्स से बहुत दूर हों. कंटेनमेंट सिस्टम टूट भी जाए, तो भी इसके बुरे असर बहुत कम हों.

यूनियन कार्बाइड की राख में मरक्युरी की मात्रा अधिक

इंटरविनर याचिका में कहा गया है कि जहरीले कचरे में मध्य प्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड रिपोर्ट में बताई गई तय लिमिट से मरक्यूरी की मात्रा अधिक है. वहीं, इस मामले में सरकार की ओर से अधिवक्ता ने एक एनिमेटेड वीडियो प्रेजेंटेशन के साथ यह दलील दी कि जहरीली राख को रोकने के लिए जो स्ट्रक्चर बनाया है, सबसे मॉडर्न सुरक्षा उपायों का इस्तेमाल करते हुए बनाया गया है. हालांकि, हाईकोर्ट इस बात से संतुष्ट नहीं हुआ कि प्रस्तावित कंटेनमेंट स्ट्रक्चर किसी भी तरह की जियो-टेक्टोनिक एक्टिविटी या भूकंप से होने वाले नुकसान से पूरी तरह सुरक्षित है.

युगलपीठ ने अपने आदेश में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि बारिश में नई सड़कें बह जाती हैं और पुल गिर जाते हैं, और इससे भी बुरा जब ओवरब्रिज 90 डिग्री मोड़ के साथ बनाए जाते हैं, जिससे यह राज्य पूरे देश में मजाक का पात्र बन जाता है. ऐसे राज्य की इंजीनियरिंग की काबिलियत पर पूरा भरोसा करना तबाही को न्योता देना हो सकता है. इस कोर्ट की चिंता को सरकार का मजाक उड़ाने जैसा नहीं समझना चाहिए, बल्कि कोर्ट जो सावधानी बरत रहा है, वह एक बार चोट खाने के बाद दूसरी बार बचने जैसा है.
कोर्ट ने याद दिलाया भोपाल गैस कांड का वो दिन

हाईकोर्ट में युगलपीठ ने तल्ख टिप्पणी जारी रखते हुए कहा कि भोपाल में फैक्ट्री तब तक सुरक्षित थी? जब तक कोई मुसीबत नहीं आई और लगभग बीस हजार लोगों की जान एक पल में चली गई. पांच लाख दूसरे लोगों को अपनी बाकी की जिंदगी सांस लेने और कई तरह की दिक्कतों से जूझना पड़ा रहा है. इसलिए, जब जहरीली राख को रोकने की बात आती है, शायद आखिरी सांस तक, तो कोई भी सावधानी ज्यादा नहीं होती. इसलिए जहरीली राख की लैंडफिलिंग साइट को आबादी के पास रखना कोर्ट को मंजूर नहीं.

लैंडफिलिंग के लिए अलग जगह चुनें : हाईकोर्ट

युगलपीठ ने राज्य सरकार को निर्देशित किया था कि जहरीली कचरे की रखा की लैंडफिलिंग के लिए सबसे अच्छी टेक्निकल एक्सपर्टीज पाने ग्लोबल टेंडर निकालाजाए. कोर्ट ने सरकार से इस संबंध में भी जानकारी प्रस्तुत करने के आदेश दिए हैं.इसके अलावा लैंडफिलिंग के लिए दूसरा स्थान चयन करने के भी निर्देश दिए हैं.
राख में मरक्यूरी, ये इंसानों के लिए कितनी खतरनाक?

WHO के मुताबिक, '' मरक्यूरी यानी पारा इंसानी सेहत के लिए बेहद खतरनाक होता है. आमतौर पर हर व्यक्ति किसी न किसी स्तर पर मरक्यूरी के संपर्क में आता है, हालांकि इसकी मात्रा बहुत कम होती है. लेकिन मरक्यूरी की मात्रा अधिक हो और ये सांस या भोजन के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाए तो ये फेफड़े और दिमाग को डैमेज कर देती है. दूषित मछलियों और शेलफिश में भी मरक्यूरी की मात्रा अधिका होती है, जिससे किडनी भी खराब हो सकती हैं. यह प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए भी बेहद खतरनाक है, क्योंकि ये गर्भ में पल रहे बच्चे और जीवन के शुरुआती दिनों में बच्चे के विकास में बाधा डाल सकती है.''

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