राजनांदगांव , छत्तीसगढ़ राज्य में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अधीन संचालित कृषि विज्ञान केंद्रों के अधिकारी-कर्मचारी अपनी वेतन विसंगति, अपूर्ण वेतन भुगतान तथा वैधानिक सेवा-लाभों की बहाली को लेकर जारी आंदोलन के तहत 23 फरवरी से अनिश्चितकालीन काम बंद हड़ताल सह धरना-प्रदर्शन पर बैठ गए हैं। सोमवार को इस अनिश्चितकालीन आंदोलन का प्रथम दिवस था।

संघ के द्वारा 16 से 20 फरवरी तक घोषित पांच दिवसीय काम बंद हड़ताल के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन से स्पष्ट, लिखित व समयबद्ध समाधान की अपेक्षा की गई थी। किंतु इस पूरे अवधि में किसी भी प्रकार की वैधानिक, न्यायोचित निर्णय नहीं लिया गया, जिससे विवश होकर संघ को आंदोलन को अनिश्चितकालीन स्वरूप ​दिया। हड़ताल अवधि के दौरान संघ के प्रतिनिधिमंडल द्वारा विश्वविद्यालय प्रशासन से कई दौर की चर्चा की गई, परंतु कुलपति स्तर पर जिम्मेदारी से बचने वाला रुख अपनाया गया। कभी विषय को राज्यपाल अथवा राज्य शासन से जोड़कर चर्चा टाली गई, तो कभी वित्त विभाग का हवाला देकर वार्ता को उलझाया गया। परिणाम स्वरूप कोई ठोस, लिखित एवं क्रियान्वयन योग्य निर्णय सामने नहीं आया।

वेतन और सेवा-लाभों की जिम्मेदारी मेजबान विश्वविद्यालय की है केवीके और एआईसीआरपी का राष्ट्रीय मंच के अध्यक्ष डॉ. मनोज शर्मा ने अपने संदेश में स्पष्ट कहा है कि कृषि विज्ञान केंद्रों की हड़ताल का सीधा नकारात्मक प्रभाव किसानों, कृषि विस्तार सेवाओं व राज्य की कृषि व्यवस्था पर पड़ रहा है। दो टूक कहा कि केवीके के अधिकारी-कर्मचारी विश्वविद्यालय की अमानत हैं, आईसीएआर की नहीं और उनके समस्त वेतन व सेवा-लाभों की जिम्मेदारी मेजबान विश्वविद्यालय की है। संघ ने विश्वविद्यालय द्वारा जारी पूर्व में स्थगित आईसीएआर पत्र का भ्रामक हवाला देने तथा आईसीएआर के 75 प्र​ि​तशत अंशदान को 100 प्रतिशत बताकर विश्वविद्यालय के वैधानिक 25 प्रतिशत दायित्व से बचने के प्रयास को तथ्यात्मक रूप से असत्य व आपत्तिजनक बताया।

By kgnews

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