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खाटू धाम में कैसे प्रकट हुआ बाबा श्याम का शीश? जानिए बर्बरीक से खाटू श्याम बनने की चमत्कारी कथा

26/04/2026

KGNEWS धार्मिक डेस्क।
राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम मंदिर देशभर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि इसी पावन धाम में बाबा श्याम का दिव्य शीश प्रकट हुआ था। भक्त उन्हें हारे का सहारा, खाटू नरेश और श्याम बाबा के नाम से पूजते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में बर्बरीक अत्यंत पराक्रमी योद्धा थे। वे घटोत्कच के पुत्र और भीम के पौत्र माने जाते हैं। कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक की परीक्षा ली थी। बर्बरीक ने दानवीरता दिखाते हुए अपना शीश भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया था।


कथा के अनुसार, बर्बरीक ने महाभारत युद्ध देखने की इच्छा जताई। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनका शीश एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया, जहां से उन्होंने पूरे युद्ध का दर्शन किया। युद्ध समाप्त होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलियुग में वे उनके ही नाम “श्याम” से पूजे जाएंगे।

खाटू में कैसे प्रकट हुआ शीश?


लोककथा के अनुसार, समय बीतने के बाद बाबा श्याम का शीश राजस्थान के सीकर जिले के खाटू गांव में भूमि के अंदर प्रकट हुआ। मान्यता है कि खाटू गांव में एक गाय प्रतिदिन एक स्थान पर जाकर अपने आप दूध गिराने लगी। जब ग्रामीणों ने उस स्थान की खुदाई की, तो वहां से एक दिव्य शीश प्रकट हुआ।
यह बात तत्कालीन शासक रूप सिंह चौहान तक पहुंची। कहा जाता है कि उसी रात राजा को स्वप्न में बाबा श्याम ने दर्शन देकर कहा कि वे बर्बरीक हैं और उनका शीश इसी स्थान पर प्रकट हुआ है। इसके बाद राजा ने विधि-विधान से पूजन कर उस स्थान पर मंदिर निर्माण करवाया।


आज वही स्थान विश्व प्रसिद्ध खाटू श्याम मंदिर के रूप में जाना जाता है, जहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। फाल्गुन मेले के दौरान यहां लाखों भक्त बाबा श्याम के दर्शन करने आते हैं और “हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा” के जयकारों से पूरा खाटू धाम गूंज उठता है।

धार्मिक मान्यता
भक्तों की मान्यता है कि सच्चे मन से बाबा श्याम की आराधना करने पर जीवन के संकट दूर होते हैं। खासकर जिन लोगों को जीवन में हार, निराशा या कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, वे बाबा श्याम को अपना सहारा मानते हैं।


नोट: यह समाचार धार्मिक मान्यताओं, लोककथाओं और प्रचलित कथाओं पर आधारित है। KGNEWS इन मान्यताओं की ऐतिहासिक पुष्टि का दावा नहीं करता।

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