वेतन समझौता शीघ्र करने की मांग को लेकर श्रमिकों ने किया प्रदर्शन, जलाई श्रम संहिता की प्रतियां

भारतीय इस्‍पात प्राधिकरण सेल के कर्मचारियों का वेतन समझौता एक जनवरी 2017 से लंबित है। इसके खिलाफ भिलाई स्‍टील प्‍लांट के कर्मचारियों ने गुरुवार को प्रदर्शन किया। श्रम कानून में किए गए बदलाव के खिलाफ गुस्‍सा जाहिर किया। श्रम संहिताओं की प्रतियां फाड़ कर जलाया। वेतन समझौता को लेकर सेल प्रबंधन की मनमानी के खिलाफ संयुक्त प्रदर्शन किया।

श्रम संहिता से प्रबंधन को मिली मनमानी की छूट

इस अवसर पर यूनियन नेताओं ने कहा कि मानसून सत्र में जिस तरह से केंद्र सरकार ने 29 श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं में समाहित करने की आड़ में कर्मचारियों के श्रम अधिकारों में कटौती की गई है, उससे प्रबंधन को मनमानी करने की छूट मिलेगी।

वेतन समझौता को लेकर प्रबंधन का कर्मचारियों के प्रति रवैया अपमानजनक

सीटू के महासचिव एसपी डे ने कहा कि जिस तरह से पिछले एनजेसीएस मीटिंग में प्रबंधन ने प्रस्ताव के नाम पर वर्तमान सुविधाओं की कटौती का प्रस्ताव दिया। वह कर्मियों के लिए अपमानजनक है। ज्ञात हो कि प्रबंधन में स्पष्ट रूप से यह प्रस्ताव दिया कि वेतन समझौता में 2017 से 2020 तक का एरियस की राशि नहीं मिलेगा, मात्र 5% एमजीबी दिया जा सकता है। पर्क्स के ऊपर किसी भी तरह का प्रस्ताव दिए बिना 10 वर्षीय वेतन समझौता का प्रस्ताव दिया। प्रबंधन का यह प्रस्ताव कर्मियों के लिए अपमानजनक है।

हड़ताल के लिए कर्मी रहे तैयार

इस अवसर पर सभी यूनियन नेताओं ने आह्वान किया कि जिस तरह किसान अपनी मांगों को लेकर आर-पार की लड़ाई लड़ रहे हैं, उसी तरह हमें भी अपने अधिकारों एवं सम्मानजनक वेतन समझौता प्राप्त करवाने के लिए सेल प्रबंधन के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ना है। आवश्यकता पड़ने पर हमें हड़ताल के लिए भी तैयार रहना है।

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कर्मियों को गुलाम बनाने की योजना

संगठन सचिव डीवीएस रेडडी ने कहा कि जिस तरह से बीते मानसून सत्र मेंसरकार ने 29 श्रम कानूनों को सरलीकृत करने के नाम पर चार श्रम संहिताओं में समाहित कर श्रमिकों के अधिकारों को छीन लिया गया। वह वास्तव में कारपोरेट घरानों के हित में कर्मियों को गुलाम बनाने की योजना है। इसी तरह तीन कृषि कानूनों को लाकर कृषि उत्पादों से न्यूनतम गारंटी मूल्य के प्रावधान को हटा दिया जाना तथा अनाज एवं खाद्य पदार्थों को आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे से बाहर रखा जाना वास्तव में भारत में पूरे कृषि क्षेत्र पर कारपोरेट घरानों की एकाधिकार कायम करवाने की योजना का हिस्सा है।

तीन श्रम कानूनों को समाप्त कर बनाये गए ‘औद्योगिक संबंध संहिता’ का कर्मियों पर प्रभाव

फिक्स्ड टर्म एंप्लायमेंट के प्रावधान के तहत प्रबंधन के पास यह अधिकार होगा कि वह 60 वर्ष की सेवानिवृत्ति आयु के लिए नियुक्ति ना कर अल्पावधि के कर्मियों की नियुक्ति करें।

300 से कम कर्मियों वाले औद्योगिक प्रतिष्ठान के नियोक्ताओं को लेआफ, छंटनी, तालाबंदी के लिए किसी से अनुमति लेने कीआवश्यकता नहीं होगी ।

18000 प्रति माह से अधिक वेतन प्राप्त करने वाले सुपरवाइजर कर्मियों को वर्कर नहीं माना जाएगा। ऐसे कर्मी संहिता के अधिकांश प्रावधानों के अंतर्गत आने वाले अधिकारों से वंचित रहेंगे।

चार श्रम कानूनों को विलोपित कर बनाए गए वेतन संहिता’ का कर्मियों पर प्रभाव

किसी कर्मी द्वारा अनाधिकृत अनुपस्थित होने पर नियोक्ता को उनके एक दिन की अनुपस्थिति पर आठ दिन का वेतन काटने का अधिकार दिया गया है ।

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श्रम अधिकारी द्वारा कर्मचारी के पक्ष में दिए गए वेतन संबंधी निर्णय के खिलाफ नियोक्ता या प्रबंधन, संबंधित निर्णय के तहत भुगतान की जाने वाली राशि जमा किए बिना अपील पर जा सकता है। इससे न्यायिक प्रक्रिया में होने वाले विलम्ब से पीड़ित कर्मी परेशान होगा।

क्या क़ानून पारित करने वालों को क़ानून के प्रभाव की है जानकारी

यूनियन नेताओं ने सवाल किया कि संसद के बीते मानसून सत्र में जिस तरह से तीन दिन में 17 कानूनों को संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत कर पारित करने सहित कुल 25 कानूनों को पारित कराया गया, क्या किसी भी सांसद के लिए उन कानूनों के प्रावधानों को पढ़कर यह सुनिश्चित करना संभव है कि वे सारे प्रावधान उस जनता के हित में है। जिन्होंने उन्हें चुना है। स्थानीय सांसद से सवाल किया गया कि क्या एक दिन की अनाधिकृत अनुपस्थिति पर आठ दिन का वेतन काटा जाना उचित है। जैसे कि कोड ओन वेजेस की धारा 20 में इस प्रावधान को जोड़ा गया है। क्या नियोक्ता को महिला कर्मियों को रात्रि पाली में नियुक्ति का अधिकार देना उचित है? क्या 300 से कम कर्मियों वाले औद्योगिक प्रतिष्ठानों को स्थाई आदेश के दायरे से बाहर रखना उचित है ? कई प्रावधान है जो जनता के और कर्मियों के हित में नहीं है। यूनियन नेताओं ने कहा कि उन्हें पूरा यकीन है कि सांसद कर्मियों पर गुलामी थोपने वाली नीतियों के खिलाफ है, लेकिन सांसदों को इतना समय ही नहीं दिया गया कि वे इसका अध्ययन कर इसका उनके क्षेत्र की जनता पर पड़ने वाले प्रभाव पर विचार कर वे इसे पारित करते हैं।

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