राजनीतिक पार्टियों की भिन्न विचारधारा के परे अचानक कुंभकरणीय नींद भी टूटी थी
राजनांदगांव//राजनांदगांव वाकई संस्कारधानी है इससे इनकार नहीं किया जा सकता ऐसे अनेकों उदाहरण देखने को मिलेंगे जिसमें कब धुर विरोधी राजनीतिक विचारधारा के लोग अचानक ही किसी मुद्दे पर इस कदर सकरी नजर आते हैं उस भाईचारे को याद करके ऐसा लगता है कि वाकई काश संपूर्ण भारत भी विविधता में इसी एकता का सूत्र धार होता! राजनांदगांव के विकास को लेकर गाहे बगाहे चौक चौराहे और आने को कॉलोनी में चर्चा इस बात को लेकर होती है की राजनांदगांव में चहूं ओर गंदगी का आलम है बस बजबजाती नालियां कूड़ो से भरा बाजार और सड़के मानो गौशाला में जुगाली करते हुए मवेशियों से अटा होता हैं। राजनांदगांव की वह मुख्य सड़के जहां शायद ही मवेशियों से मुक्त हो जिसकी ना किसी को परवाह है ना परवाह करने वाले जिम्मेदारी उठाने वाले एजेंसी को भी सब बेखबर है काऊ कैचर करे तो क्या करे। क्योंकि उन्हें निर्देश देने वाले भी थक चुके हैं। किसी भी शहर की सफाई और प्रदूषण के मापदंड का पैमाना सरलता से तो हम लोगों को इसी से मापना चाहिए कि पहने हुए सफेद वस्त्र अगर दूसरे दिन किसी काम के नहीं तो समझ जाना चाहिए की चहुं और धूल भरे गुब्बारे से शहर के लोग अपनी कीमती सांस को ले रहे हैं। फिर उसके प्रदूषण का क्या पैमाना होना चाहिए यह तो नगर निगम ही तय कर पाएगा और उनके साथ पर्यावरण के पैमाने को मुहैय्या करने वाला विभाग। शहर में उखड़ी सड़कों को लेकर चर्चा सरगर्म है। इसके लिए जिम्मेदार जनप्रतिनिधि अधिकारी या संस्कारधानी की जनता यह तय करने के पीछे मुझे राजनांदगांव की एक सबसे बड़ी और मजेदार घटना की याद तरो ताजा हो रही है। घटना है “टोल प्लाजा” ठाकुर टोला जब किसी नेता की गाड़ी को टॉल देने के लिए रोका गया फिर क्या था एक ऐसा बवंडर खड़ा किया गया जिसमें सोशल मीडिया के प्लेटफार्म से निकला संदेश एक आंदोलन का रूप ले लिया फिर क्या था भाजपा और क्या थी कांग्रेस सारे लोग उम्र पड़े यहां तक की बस ट्रक एसोसिएशन भी सब के सब पहुंच गए और इस कदर तोड़फोड़ का वातावरण निर्मित हुआ की लगा कि संस्कारधानी के लोग किसी विषय को लेकर आक्रोशित भी होते हैं। वह आंदोलन क्यों था किसके हित का था उससे क्या निकाल कर आया यह तो सब लोगों ने भांप लिया क्या इसी तर्ज पर राजनांदगांव के लोगों ने फ्लावर के बाद किसी जनहित के मुद्दे पर दोनों ही राजनीतिक दलों को एक होते देखा गया है या मुसीबत और समस्या को देखकर लोग अपना सुविधाजनक रास्ता तैयार कर अपनी खुशी इस में तलाश रहे हैं। कभी स्मार्ट शहर बनाने का संकल्प लिए लोगों से सुझाव मांगने वाला नगर निगम आज लोगों को मूलभूत आवश्यकताओं को दे पाने में क्या वाकई कारगर साबित हो रहा है जहां करोड़ों करोड़ों रुपए विकास के लिए आता है। अब आने वाले समय में नगरी निकाय चुनाव है हर जन्म प्रतिनिधि अपने क्षेत्र में विकास की गाथा गाएगा धरातल पर क्या है यह तो जनता ही बेहतर बता पाएंगे । संस्कारधानी अनेक गंभीर समस्याओं के आंदोलन की बांट जोह रहा है।
