रायपुर सिंगल यूज प्लास्टिक (single use plastic)पर प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद शहर को प्लास्टिक से अब भी आजादी नहीं मिली है। आलम यह है कि हर साल प्लास्टिक का उपयोग करने वालों की संख्या कम होने के बजाय और बढ़ रही है। चारों दिशाओं में स्थापित कचरा संग्रहण केंद्र( waste collection center)में हर महीने बड़ी संख्या में डिस्पोजल, पॉलीथिन और अन्य सिंगल यूज प्लास्टिक पहुंच रहा है। हरिभूमि ने जब इसकी पड़ताल की, तो पता चला, राजधानी में हर महीने 60 हजार किलो से भी अधिक प्लास्टिक कचरा निकल रहा है। प्रतिबंध के बाद भी निगम शहर में प्लास्टिक को चलन से बाहर नहीं कर पाया है। शहर में ई- वेस्ट का निष्पादन करने वाली कंपनी का कहना है कि छत्तीसगढ़ में 800 से अधिक टन प्लास्टिक कचरा निकल रहा है, घरों में इसका हिस्सा 40 प्रतिशत से भी अधिक है। हर साल बढ़ रहा शहर में प्लास्टिक निगम और प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की कार्रवाई के बाद भी शहर में प्लास्टिक की उपयोगिता कम नहीं हो रही है। सब्जियों के बाजार में अब भी खुले में प्लास्टिक की झिल्लियां ग्राहकों को दी जा रही हैं। बोर्ड ने शनिवार और रविवार को बाजारों में औचक जांच और कार्रवाई की बात कही थी, लेकिन यह मामला भी अब ठंडे बस्ते में जा चुका है। यही कारण है कि 2021-22 में जहां शहर में हर महीने 50 हजार किलो प्लास्टिक निकलता था, जो अब 2023 में बढ़कर 60 हजार किलो तक पहुंच गया है। कार्रवाई में लापरवाही के चलते प्रदूषण का स्तर भी बढ़ता जा रहा है। सख्ती के बावजूद पॉलीथिन बैग उपलब्ध शहर में बड़ी आसानी से किराना दुकानों में लोगों को पॉलीथिन बैग उपलब्ध हो रहे हैं। विभाग कई फैक्ट्रयों को बंद करा चुका है, जिसके बाद अब दूसरे राज्यों से पॉलीथिन शहरों तक पहुंच रही है। केंद्रीय पर्यावरण संरक्षण मंडल ने 20 उत्पादों की पहचान की है। इसमें ईयर बड्स, गुब्बारे, झंडे, थर्माकोल प्लेट, कप, गिलास, चम्मच, चाकू, स्ट्रा आदि शामिल हैं। मिट्टी की उर्वरा शक्ति हो रही प्रभावित कृषि विवि के मृदा विशेषज्ञ के डॉ. एमके राव ने बताया कि, पॉलीथिन को फेंकने या डंप करने पर यह जमीन में दबती चली जाती है, लेकिन नष्ट नहीं होती। इससे मिट्टी की उर्वरा क्षमता कम हो जाती है। शहरी क्षेत्रों की मिट्टी पर सबसे ज्यादा विपरीत प्रभाव बीते कुछ सालों में देखने को मिले हैं। 30 गुना ज्यादा खतरनाक साइंस कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर रसायन डॉ. दीपक शर्मा ने बताया कि,डंप साइट पर पॉलीथिन बायोडिग्रेडेबल वेस्ट से मिलकर मीथेन गैस छोड़ती है। मीथेन कार्बन डाई ऑक्साइड की तुलना में 30 गुना ज्यादा हानिकारक है। मीथेन जलवायु परिवर्तन के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है। ज्यादा समय तक पुरानी पॉलीथिन डंप साइट, नालियों में इसकी गंध से घुटन महसूस होती है, जो कि मीथेन गैस का प्रभाव है।
