राजनांदगांव, परामर्श की कमी और जागरूकता के अभाव में अनेक माता-पिता अपने बच्चों को संतुलित आहार नहीं दे पाते, जिसके परिणाम स्वरूप बच्चे कुपोषण का शिकार हो जाते हैं। इसी गंभीर चुनौती का स्थायी समाधान खोजने के लिए जिला प्रशासन ने यूनिसेफ और एबीस के सहयोग से ‘पोट्ठ लइका’ कार्यक्रम की शुरुआत की, जिसका छत्तीसगढ़ी अर्थ है ‘स्वस्थ बच्चा’। यह अभिनव कार्यक्रम जून 2024 में कलेक्टर के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ। इसकी शुरुआत जिले के 241 सर्वाधिक कुपोषणग्रस्त आंगनबाड़ी केंद्रों से की गई। केवल छह महीनों में इस पहल ने उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं- जून से दिसंबर 2024 के बीच 3413 में से 2246 बच्चों यानी 65.81 प्रतिशत बच्चों को कुपोषण से बाहर निकाला गया। यह पूरी तरह जीरो कॉस्ट इनोवेशन है, जिसमें न कोई अतिरिक्त खर्च हुआ और न किसी बड़े ढांचे की आवश्यकता पड़ी।
जिला कार्यक्रम अधिकारी गुरप्रीत सिंह कौर ने बताया कि इसके तहत हर गुरुवार को लक्षित आंगनबाड़ियों में ‘पालक चौपाल’ का आयोजन किया जाता है, जिसमें बच्चों के माता-पिता, नवविवाहित एवं गर्भवती महिलाएं, सरपंच, सचिव और समूह से जुड़ी महिलाएं शामिल होती हैं। इस चौपाल में पूरे समुदाय को सुपोषण के मुद्दों से जोड़ा जाता है और बच्चों के स्वस्थ भविष्य के लिए संवाद एवं परामर्श दिया जाता है। बुधवार को एनीमिया परीक्षण और स्वास्थ्य जांच की जाती है, जबकि अन्य दिनों में अधिकारियों द्वारा घर-घर जाकर जागरूकता फैलाने का कार्य किया जाता है।
केवल सामुदायिक भागीदारी, परामर्श और निगरानी से सफलता पाई गई। कार्यक्रम की सफलता से उत्साहित होकर जून 2025 से इसे पूरे जिले में विस्तारित किया गया, जिसमें 9751 कुपोषित बच्चों को लक्षित किया गया।
सितंबर 2025 की स्थिति के अनुसार 2295 बच्चे अब कुपोषण से पूरी तरह बाहर आ चुके हैं। जिले के हजारों कमजोर बच्चों को स्वस्थ्य कर उनकी मुस्कान लौटाने का काम किया जा रहा है। यह मुस्कान सिर्फ स्वास्थ्य की नहीं, बल्कि आशा, बदलाव और बेहतर भविष्य की पहचान बन गई है।
