राजनांदगांव, जैन बगीचे के उपाश्रय भवन में 6 नवंबर को चातुर्मास का अंतिम प्रवचन देते हुए वीरभद्र ;विराग मुनिजी ने कहा कि हमने चातुर्मास के दौरान क्या पाया हैए इसका आंकलन स्वयं करें। कहा कि हमने अपना समय और पुरुषार्थ भौतिक सुख.सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए लगा दिया। हमने आत्म कल्याण के लिए अब तक क्या किया इस पर चिंतन अवश्य करें। ऐसी आराधना करें कि हम इस भव से पार हो जाएं। भौतिक जगत की सुख.सुविधा तो यहीं रह जाएगी किंतु आत्मिक खजाना तो हमारे साथ ही जाएगा।
कहा कि आध्यात्मिक जगत कहता है कि जीव तू अपनी बात कर अन्य किसी के पंचायत में उलझकर मत रह जा। तू स्वयं को जान कि तू कौन है कहा कि हम पर्याय को ही अपना पहचान मान लिए हैं जबकि पर्याय बदलता रहता है। हमें तुरंत परिणाम की निरंतरता लाने कोशिश करना चाहिए हमें अपने अंदर की निर्मलता का ध्यान रखना चाहिए। हमें यह ध्यान भी रखना चाहिए कि हम जो बोले उसमें हस्ताक्षर कर सकें और जो सोचे उसे सामने ला सकें। कहा कि थोड़ा सा धर्म कर लेने मात्र से आत्म कल्याण हो जाएगा ऐसा नहीं है। अब तक जो किया उससे कई गुना ज्यादा कार्य हम पिछले भव में कर चुके हैं।
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