राजनांदगांव : नील हरित शैवाल फसलों के लिए सस्ता और टिकाऊ जैविक उर्वरक

राजनांदगांव । कृषि विज्ञान केन्द्र राजनांदगांव की प्रमुख एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. गुजन झा ने नील हरित शैवाल (बीजीए) का धान व अन्य फसलों के महत्व के संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि ब्लू ग्रीन शैवाल (नील-हरित शैवाल) जिसे सायनोबैक्टीरिया के रूप में भी जाना जाता है। नील हरित शैवाल प्रकाश संश्लेषण करने वाले जीवाणुओं का एक समूह है, जो ताजे और समुद्री पानी में पाए जाते हैं। यह एक प्राकृतिक जैविक उर्वरक है, जो धान के खेतों में नाइट्रोजन को स्थिर कर पैदावार बढ़ाने में मदद करता है। धान की फसल में नील हरित शैवाल एक बेहतरीन, सस्ता और टिकाऊ जैविक उर्वरक है, जो हवा से नाइट्रोजन को सोखकर मिट्टी में स्थिर करता है। यह नाइट्रोजन की कमी को पूरा कर उपज में 10 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि करता है। इसके अलावा यह मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ाता है और यूरिया पर होने वाले खर्च को कम करता है। ब्लू ग्रीन शैवाल को सायनोबैक्टीरिया, नील-हरित काई एवं ब्लू-ग्रीन एल्गी के नाम से भी जानते है।
धान की फसल में नील हरित शैवाल के विभिन्न लाभ है। यह वातावरण से नाइट्रोजन को स्थिर करके पौधों को उपलब्ध कराता है, जिससे 25-30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक नाइट्रोजन की बचत होती है। यह मिट्टी में जीवांश की मात्रा बढ़ाता है, जिससे मिट्टी उपजाऊ और भुरभुरी बनती है। इसके उपयोग से यूरिया और अन्य रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है, जिससे खेती की लागत घटती है। यह धान की उपज में 10 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि कर सकता है। यह मिट्टी में फायदेमंद सूक्ष्म जीवाणुओं को बढ़ाता है और धान की जड़ों के विकास में सहायक होता है। नील हरित शैवाल, विशेष रूप से एनाबीना और नॉटोक, धान के खेतों के लिए एक सस्ता और सुलभ जैविक नाइट्रोजन उर्वरक हैं। वेनाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं और मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ जोड़कर उसकी उर्वरता बढ़ाते हैं। ये सूक्ष्मजीव प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से वातावरण और पानी में ऑक्सीजन छोड़ते हैं, जो जलीय जीवन (मछलियों सहित अन्य जलीय जीव) के लिए आवश्यक है। ये तालाबों और अन्य जल निकायों में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य पोषक तत्वों का उपयोग करके पानी को स्वच्छ रखने में मदद करते हैं।
नील हरित शैवाल के सभी उत्पाद सुरक्षित नहीं होते हैं। प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त शैवाल में विषाक्त पदार्थ (माइक्रोसिस्टिन) हो सकते हैं। जो यकृत को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए केवल प्रमाणित और प्रयोगशाला में उगाए गए उत्पादों का ही उपयोग करना चाहिए। नील हरित शैवाल धान की फसल के लिए एक बेहतरीन, सस्ती और जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकारक खाद है। इसे घर पर या खेत में आसानी से उगाया जा सकता है। इसके उत्पादन के लिए गड्ढा (2 मीटर* 3 मीटर* 0.2 मीटर) में पानी, सूखी मिट्टी, गोबर और फास्फोरस का मिश्रण तैयार किया जाता है। जिसे 30-45 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 10-15 दिनों में शैवाल की मोटी परत मिल जाती है। इसे बनाने के लिए धूप वाली जगह पर 2 मीटर लंबा, 2 मीटर चौड़ा और 20-30 सेमी गहरा गड्ढा खोदें। गड्ढे में 100 किलोग्राम सूखी मिट्टी और 10-15 किलोग्राम गोबर की खाद मिलाकर बराबर कर दें। गड्ढा में 5-10 सेमी ऊंचाई तक पानी भरें। इसमें 200 ग्राम सुपर फास्फेट डालें। अब इस मिश्रण में 1 से 2 किलोग्राम नील हरित शैवाल का कल्चर (स्टार्टर) डालें, जो कृषि केंद्रों पर मिलता है। तेज धूप में पानी सूखने पर पानी डालते रहें। लगभग 10 से 15 दिनों में (गर्मियों में), जब पानी सूख जाए और ऊपर नीली-हरीपरत बन जाए, तो इसे खुरचकर इक_ा कर लें और सुखाकर रख लें। 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में छिड़काव करें। रोपाई के 7-10 दिन बाद, जब खेत में पानी भरा हो, तब इसका उपयोग करना सबसे अच्छा होता है। उपयोग के बाद खेत को 10-15 दिनों तक सूखने न दें। इसके विकास के लिए खेत में पर्याप्त मात्रा में फॉस्फोरस का होना आवश्यक है। नील हरित शैवाल के उत्पादन के लिए 30-45 डिग्री सेल्सियस तापमान आवश्यक है। हरी शैवाल को नष्ट करने के लिए 1 ग्राम नीलाथोथा का 1 लीटर पानी में घोल उपयोग किया जा सकता है।

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