राजनांदगांव | शासकीय दिग्विजय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय राजनांदगांव के प्राचार्य डॉ. सुचित्रा गुप्ता के कुशल मार्गदर्शन एवं विभागाध्यक्ष डॉ किरण लता दामले के निर्देशन में दिनांक 23 अप्रैल 2025 को आमंत्रित अतिथि व्याख्यान का आयोजन किया गया जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में डॉ अनुपमा श्रीवास्तव सहायक प्राध्यापक भिलाई महिला महाविद्यालय दुर्ग छत्तीसगढ़ मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए | विभागाध्यक्ष डॉ के एल दामले ने प्राचार्य एवं मुख्य अतिथि को पुष्प कुछ देकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। सर्वप्रथम प्राचार्य डॉ सुचित्रा गुप्ता ने अपने उद्बोधन में कहा कि प्रिय विद्यार्थियों, आज मैं आप सभी से व्यक्तित्व विकास के विषय पर कुछ विचार साझा करना चाहता हूँ। व्यक्ति का व्यक्तित्व केवल उसके बाहरी रूप-रंग या पहनावे से नहीं, बल्कि उसके विचारों, आचरण, व्यवहार और दृष्टिकोण से परिभाषित होता है। एक संतुलित और प्रभावशाली व्यक्तित्व न केवल सफलता की कुंजी होता है, बल्कि समाज में आपके प्रति सम्मान और विश्वास को भी बढ़ाता है। व्यक्तित्व विकास का सबसे पहला कदम है – आत्मचिंतन। जब हम अपनी कमजोरियों और योग्यताओं को पहचानते हैं, तभी हम सुधार की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। अच्छे संवाद कौशल, सकारात्मक सोच, आत्मविश्वास, अनुशासन, और सहानुभूति – ये सभी गुण एक समग्र व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक होते हैं। विद्यार्थी जीवन ही वह समय होता है जब आप अपने व्यक्तित्व को निखार सकते हैं। अध्ययन के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों, खेलों और सामाजिक गतिविधियों में भाग लें। ये अनुभव आपके भीतर नेतृत्व, टीम वर्क और समस्या समाधान जैसी महत्वपूर्ण क्षमताएँ विकसित करते हैं। अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि व्यक्तित्व विकास एक सतत प्रक्रिया है। इसे समय दें, मेहनत करें, और सबसे महत्वपूर्ण – स्वयं पर विश्वास रखें। आप सभी में अद्भुत संभावनाएँ हैं, उन्हें पहचानिए और अपने सपनों को आकार दीजिए। डॉ अनुपमा श्रीवास्तव ने वर्तमान युग में केवल शैक्षणिक योग्यता ही सफलता की गारंटी नहीं है, बल्कि एक संतुलित, सशक्त और सकारात्मक व्यक्तित्व भी उतना ही आवश्यक है। व्यक्तित्व का तात्पर्य है – एक व्यक्ति की सोच, उसकी भाषा शैली, व्यवहार, आत्मविश्वास, और उसके मूल्यों का समुच्चय। यह वह विशेषता है, जो किसी भी व्यक्ति को भीड़ से अलग पहचान देती है। व्यक्तित्व विकास का अर्थ है – अपने भीतर की क्षमताओं को पहचानना, उन्हें तराशना और समय-समय पर उन्हें बेहतर बनाते रहना। इस प्रक्रिया में स्व-अनुशासन, सकारात्मक सोच, भावनात्मक बुद्धिमत्ता, समय प्रबंधन और संवाद कौशल जैसी चीजें प्रमुख भूमिका निभाती हैं। जब व्यक्ति अपने भीतर आत्मविश्वास और स्पष्ट सोच विकसित करता है, तो वह किसी भी परिस्थिति में सही निर्णय लेने में सक्षम हो जाता है। युवाओं को चाहिए कि वे केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहें, बल्कि व्यवहारिक ज्ञान, सामाजिक सहभागिता और नैतिक मूल्यों पर भी ध्यान दें। एक अच्छा व्यक्तित्व वही है जो न केवल खुद को आगे बढ़ाता है, बल्कि समाज को भी सकारात्मक दिशा देता है। अंततः, याद रखें – व्यक्तित्व कोई जन्मजात गुण नहीं है, यह प्रयासों से निखारा जाता है। स्वयं में सुधार की निरंतर प्रक्रिया ही व्यक्तित्व विकास की असली कुंजी है। उक्त कार्यक्रम में विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ संजय ठिसके, गुरप्रीत सिंह भाटिया , चिरंजीव पाण्डेय, करुणा रावटे, कु. जागृति चंद्राकर सहित विभाग के स्नातक एवं स्नातकोत्तर के समस्त विद्यार्थी सम्मिलित हुए।
