राजनांदगांव | जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की प्रमुख प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवीजी द्वारा 15 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला का आयोजन दिनांक 25 मार्च से 8 अप्रैल 2025 तक शाम 7 से रात 9 बजे तक स्टेट हाई स्कूल मैदान राजनांदगांव, में किया जा रहा है। कल प्रवचन के दूसरे दिन देवीजी ने वेद और शास्त्रों के प्रमाण सहित बताया कि 84 लाख प्रकार की योनियो में मनुष्य शरीर सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि भगवान ने मनुष्यांे को ज्ञान शक्ति दी, कर्म करने की शक्ति प्रदान की, जिससे ईश्वर रूपी अंश को जाना जा सकता है। अगर मनुष्य देह पाकर ईश्वर रूपी आनंद को प्राप्त नही किया तो मनुष्य शरीर छूटने पर 84 लाख प्रकार की हीन योनियों में भटकना पड़ेगा। विश्व का प्रत्येक जीव एकमात्र आनंद ही चाहता है। वह आनंद कहाँ है? कैसे मिलेगा? इसी के लिए अनवरत् प्रयासरत् है। क्योंकि जीव ईश्वर का अंश है। रामायण में भी कहा गया है-

 ‘‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशि।।‘‘

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और वेदों के अनुसार ‘‘रसो वै सः“ अर्थात ईश्वर ही आनंद है वही रस है। इसीलिए प्रत्येक जीव ईश्वर का सनातन अंश होने के कारण अनादिकाल से आनंद की खोज में लगा हुआ है। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि वेद कहते हैं कि विश्व का प्रत्येक जीव आस्तिक है। इस उक्ति को एक उदाहरण के माध्यम से समझाया गया जैसे कोई नवजात शिशु है, वह जन्म लेते ही पहले रोता है क्योंकि जन्म के समय जो कष्ट होता है उसे वह नहीं चाहता इसलिए रोकर उस दुःख को दूर करने का प्रयास करता है। ऐसे ही किसी विद्यार्थी से पूछा जाए कि तुम पढ़ाई क्यों कर रहे हो वह कहेगा कि परीक्षा में पास हो जाए हमारी अच्छी जाॅब लग जाए। फिर पूछा जाए इससे तुम्हें क्या मिलेगा? वह कहेगा सुख मिलेगा खुशी मिलेगी तो यह सब सुख, खुशी, हैप्पीनेस, शांति आदि ईश्वर के ही पर्यायवाची शब्द है। अतः यह निर्विवाद सिद्ध होता है कि हम सभी जीव केवल ईश्वर को ही चाहते हैं क्योंकि हम प्रतिक्षण सुख पाने की होड़ में लगे हुए हैं। परंतु इसके विपरीत हमारे वेद यह भी बताते हैं, कि विश्व का प्रत्येक जीव नास्तिक है यह महान आश्चर्य है और कैसे है? यह आगे प्रवचन में बताया जाएगा। प्रवचन श्रृंखला धारावाहिक होने से प्रतिदिन सुनना अनिवार्य होगा।

बुद्धि से भगवान् को नही जाना जा सकता – सुश्री धामेश्वरी देवीजी

राजनांदगांव, स्टेट हाई स्कूल मैदान में चल रही जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी की दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के चौथे दिन देवी जी ने वेद और शास्त्रों के प्रमाण सहित बताया कि सर्वान्तरयामी सर्वशक्तिमान भगवान् को बुद्धि के द्वारा बड़े बड़े ज्ञानी तो क्या, ब्रम्हा भी नहीं जान सकते क्योंकि भगवान बुद्वि से परे हैं, मायातीत है। हम सभी जीव गुणों के अधीन है, भगवान माया से परे है, दिव्य है, शाश्वत है, हमारी इन्द्रिय मन बुद्वि मायिक है प्राकृत है इसलिए क्षुद्र शक्ति युक्त है। इसके अतिरिक्त भगवान् अनंत विरोधी धर्मों के अधिष्ठान भी है इसलिए बडे़ बडे़ ब्रम्हा विष्णु शंकर आदि बुद्वि के आधार पर नहीं जान सकते तो साधारण मनुष्य भी भगवान् की शक्ति को नहीं जान सकता। भगवान् छोटे से छोटे भी है, भगवान् बडे़ से बड़े भी है, वो धर्म से परे है, अधर्म से भी परे है, सृष्टी से परे है किन्तु सृष्टीकर्ता भी है, अकर्ता है किन्तु न्यायकर्ता भी है, कृपाकर्ता भी है, भगवान् से भय भी भयभीत होता है किन्तु भगवान् यशोदा मैया की छडी़ से डरते है। भगवान् को बड़े बडे़ ऋषि मुनि महात्मा अपने पराक्रम से नही जान सकते और वो आत्माराम पूर्णकाम है किन्तु ब्रजगोपियों के साथ रास भी करते है इसलिए ऐसे भगवान् को जानना बुद्वि से असंभव हैं। बुद्धि से भगवान् को जाना नही जा सकता परंतु यदि किसी पर भगवान् की  कृपा हो जाये और भगवान् की बुद्धि (दिव्य शक्ति) उसे मिल जाये, तो साधारण मनुष्य भी भगवान् को जान सकता है। भगवत् कृपा कैसे मिलेगी इस हेतु भगवत् कृपा विषय पर कल प्रकाश डाला जाएगा। प्रवचन के अंत में श्री राधाकृष्ण भगवान की आरती के साथ समापन हुआ। 15 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला का आयोजन दिनांक 8 अप्रैल 2025 तक प्रतिदिन शाम 7 से रात 9 बजे तक होगा।।

भगवद् कृपा से ही भगवान् को जाना जा सकता है – सुश्री धामेश्वरी देवीजी

राजनांदगांव, स्टेट हाई स्कूल मैदान में चल रही जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी की दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के पाचवें दिन देवी जी ने वेद और शास्त्रों के प्रमाण सहित बताया कि बुद्धि से भगवान् को जाना नही जा सकता परंतु यदि किसी पर भगवान् की  कृपा हो जाये और भगवान् की बुद्धि (दिव्य शक्ति) उसे मिल जाये, तो साधारण मनुष्य भी भगवान् को जान सकता है। भगवद् कृपा के बिना भगवान् को नहीं जाना जा सकता। वास्तव में भगवान् की कृपा का सही अर्थ समझना होगा, शास्त्रों से और संतो से। देवीजी ने यह भी बताया कि सगुण साकार भगवान् ही कृपा करता हैं इनकी कृपा के बिना किसी की भी माया-निवृत्ति नहीं हो सकती। किन्तु भगवान् की कृपा के सिद्धांत का मतलब यह नहीं की सब कुछ भगवान् ही करेगा, हमें भी कर्म करने की आवश्यकता है। कर्म का मतलब है प्रमुख रूप से मन से हरि गुरु का स्मरण एवं उनकी मानसी सेवा यह भक्ति रूपी पुरुषार्थ है।

विश्व के अधिकांश महानुभाव यह कह दिया करते है कि ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ नही हो सकता। कुछ लोग कोटेशन आदि के द्वारा प्रत्येक कर्म के लिए भगवान् को जिम्मेदार ठहराते है। उसे जैसा करना होता है, करा लेता है। किन्तु यह बात गलत है। ईश्वर ने हमें मनुष्य देह दिया, कर्म करने की शक्ति दी। चाहे हम अच्छे कर्म करे, चाहे बुरे कर्म। भगवान् उन कर्मों को नोट करता है फिर उन कर्मों के अनुसार हमें फल देता है। भगवान् ने हमें सत्कर्म करने की शक्ति दी है किंतु उसकी दी हुई शक्तियों का हम दुरुपयोग करते है। यानि संसार में आसक्ति करते है और फिर कह देते है, हमारे भाग्य में नहीं है। अथवा भगवान् को दोषी ठहराते है। मनुष्य देह प्राप्त करके ईश्वर की भक्ति करने की बजाय संसार की जिम्मेदारियों की आड़ लेते रहते हैं।

जब भगवान की भक्ति का नंबर आता है तो मनुष्य बहाना बनाता है कि मेरे भाग्य में नहीं लिखा है या तो समय नहीं आया है या तो ईश्वर की इच्छा नहीं है। इसका मतलब यह है भगवान् की इच्छा से ही मनुष्य देह मिलता है और मनुष्य देह केवल भगवान को पाने के लिए ही मिलता है क्यूंकि चैरासी लाख में पशु पक्षी कीट पतंग भगवान् को नहीं जान सकते है तो इसीलिए मनुष्य देह भगवान् देते है और जब तक हम भक्ति रुपी पुरुषार्थ नहीं करेंगे हमारा भाग्य भी अच्छा नहीं हो सकता। भाग्य को अच्छा स्वयं को बनाना पड़ता है, वो पुरुषार्थ से परिश्रम से होगा। भगवान् हमें पुरुषार्थ को करने के लिए मार्ग बताएँगे किन्तु मनुष्य को स्वयं ही पुरुषार्थ करना है और उसी पुरुषार्थ से भगवान की कृपा होगी, बहुत से लोग भगवान की कृपा का गलत मतलब लगते हैं कि सब कुछ ईश्वर ही कराता है। ईश्वर तभी कराएगा जब हम परिश्रम करेंगे किन्तु कोई कितना भी परिश्रम करे भगवान की कृपा पाने के लिए शर्त होती है वो शर्त क्या है वो कल बताया जायेगा। प्रवचन के अंत में श्री राधाकृष्ण भगवान की आरती के साथ समापन हुआ। 15 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला का आयोजन दिनांक 8 अप्रैल 2025 तक प्रतिदिन शाम 7 से रात 9 बजे तक होगा।।

शरणागति का सिद्धांत हर धर्म मानता है – सुश्री धामेश्वरी देवीजी

राजनांदगांव, स्टेट हाई स्कूल मैदान में जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज की प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी की दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के सातवें दिन देवी जी ने वेद और शास्त्रों के प्रमाण सहित बताया कि भगवान् कृपा सभी के ऊपर करना चाहते हैं। किन्तु भगवान् की कृपा का भी एक कानून है। वह कानून है कि जो भी शर्त पूरा करेगा वह उसी पर कृपा करेंगें। और वह शर्त है शरणागति। शरणागति का सिद्धांत है उसे हर धर्म मानता है। लेकिन शरणागति का मतलब यह न समझे कि भगवान कोई मूल्य ले रहे हैं। फिर लोगो को भी यह लगेगा कि हमने चारों धाम किया, हमने भजन सुने, माला फेरी तो इससे लोगों का अंहकार बढ़ेगा। इसलिए भगवान् ने गीता में शरणागति का अर्थ बताया, कुछ न करना। कुछ न करने का मतलब कर्तापन का अभिमान त्याग देना। दूसरी बात यह है कि शरणागति मन को करनी होगी। हम सभी इन्द्रियों से भगवान् शरणागति करते हैं जैसे हाथों से माला फेरना, वाणी से पाठ करना, पैरों से तीर्थो आदि में जाना लेकिन भगवान् इंद्रियों की भक्ति नोट नहीं करते । भगवान् मन भक्ति या मन की शरणागति नोट करते है इसलिये वह अकारण करूण है। जहां मन का प्रश्न आता है तो लोग बहाना बनाते हैं कि हमारा मन भगवान् में नहीं लगता। मन की शरणागति पर इसलिये जोर दिया शास्त्रों ने क्योंकि मन बंधन का कारण है और मोक्ष का भी कारण है। यह मन अनादिकाल से संसार में आसक्त है और जब तक यह संसार मे ंआसक्त है तो भगवान् में लग ही नहीं सकता। तदर्थ मन को संसार से विरक्त करना होगा यदि हम मन को संसार से विरक्त नहीं करेंगें तो केवल इंद्रियों से ही भगवान् की भक्ति करेंगें और इंद्रियों की भक्ति भक्ति नहीं है।  मन भगवान् में तभी लगेगा जब संसार से विरक्त हो जाए। और संसार से विरक्त तब तक नहीं हो सकता जब तक संसार का वास्तविक स्वरूप न समझ लें। तो संसार का वास्तविक स्वरूप क्या है यह देवी जी कल बताएंगी। दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला का आयोजन दिनांक 8 अप्रैल 2025 तक प्रतिदिन शाम 7 से रात 9 बजे तक होगा।।

By kgnews

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