जल संरक्षण में डिंडौरी ने रचा इतिहास, देश में दूसरा स्थान; 6 लाख से ज्यादा जल संरचनाएं बनीं

 डिंडौरी
मध्य प्रदेश का आदिवासी बहुल डिंडौरी जिला जल संरक्षण के क्षेत्र में देशभर में अपनी अलग पहचान बना चुका है. राष्ट्रीय स्तर पर जारी आंकड़ों के अनुसार डिंडौरी ने जल संरक्षण के क्षेत्र में देशभर में दूसरा स्थान प्राप्त किया है. साथ ही मध्यप्रदेश के सभी 55 जिलों में प्रथम स्थान हासिल कर जिले ने प्रदेश का गौरव बढ़ाया है। 

ग्रामीणों का कहना है कि अधिकारियों ने उन्हें जल संरक्षण का महत्व समझाया। उन्हें बताया गया कि पानी रोकने से ही बचेगा और फिर से उपलब्ध होगा। इस समझ के बाद, लोगों ने स्वयं प्रेरित होकर अपने घरों में जल संचय के कार्य शुरू कर दिए हैं।

दैनिक भास्कर की टीम ने दो गांवों का दौरा कर जमीनी हकीकत जानी। बजाग जनपद पंचायत की सिंहपुर ग्राम पंचायत में लगभग साढ़े तीन सौ मकान हैं। यहां हर घर में सोखता पिट और छतों से बारिश के पानी को रोकने के लिए पाइप के जरिए वाटर हार्वेस्टिंग की तैयारी की गई है।

जिला प्रशासन की इस पहल को देशभर में जनभागीदारी आधारित जल प्रबंधन के प्रेरणादायक मॉडल के रूप में देखा जा रहा है. डिंडौरी की यह उपलब्धि न केवल जल संरक्षण की दिशा में बड़ी सफलता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी मानी जा रही है. डिंडौरी जिले में शासन के निर्देशानुसार संचालित 'जल गंगा संवर्धन अभियान' एवं 'जन भागीदारी अभियान' के तहत जल संरक्षण और भूजल संवर्धन की दिशा में ऐतिहासिक कार्य किए जा रहे हैं. जिले में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में कुओं, नदियों, नालों, हैंडपंपों, ट्यूबवेल, बावड़ियों और तालाबों के आसपास व्यापक जल संरक्षण संरचनाएं विकसित की गई हैं, जिससे वर्षा जल का संरक्षण कर भूजल स्तर बढ़ाने का लक्ष्य हासिल किया जा सके। 

गांव की महिला मेकिन बाई ने बताया कि पहले उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी, लेकिन सरपंच दीपचंद पूषाम और अधिकारियों ने उन्हें जल का महत्व समझाया। इसके बाद उन्होंने स्वयं मेहनत कर और थोड़ा पैसा खर्च कर पाइप खरीदे तथा घर के सामने सोखता पिट बनाया, जिसमें अब निस्तार का पानी जा रहा है।

जमुना खैरवार ने बताया कि वे पहले पानी का महत्व नहीं जानते थे और सोचते थे कि पानी उपलब्ध कराना अधिकारियों की जिम्मेदारी है। लेकिन सरपंच और अधिकारियों द्वारा यह समझाने पर कि थोड़ी मेहनत से पानी कैसे बचाया जा सकता है और धरती को रिचार्ज किया जा सकता है। उन्होंने अपने घर में दो सोखता पिट बनवाए।

अब वे गांव में जाकर अन्य लोगों को भी जागरूक कर रही हैं ताकि बारिश का पानी रोका जा सके और आने वाली पीढ़ी के लिए पानी बच सके। आजीविका परियोजना से जुड़ी कृषक सखी सुदामा सुरेश्वर ने बताया कि 'मां की बगिया' योजना के तहत पांच हितग्राही हैं। एक बगिया में 15 नींबू और 35 आम के पेड़ लगाए गए हैं, जिन्हें टपक पद्धति (ड्रिप इरिगेशन) से पानी दिया जा रहा है।

पेड़ों को टपक पद्धति से पानी देना का काम शुरू किया आजीविका परियोजना से जुड़ी कृषक सखी सुदामा सुरेश्वर कहती है कि ‘मां की बगिया’ के पांच हितग्राही है। एक बगिया में 15 नींबू और 35,आम के पेड़ लगवाए है। पानी को बचाने और पेड़ो को सुरक्षित रखने के लिए हितग्राहियों को जागरूक किया।

इसके बाद उनको टपकना, हांडी और स्लाइन की बोतल से पेड़ो को पानी देने के बारे में बताया। अब हितग्राही स्वयं पेड़ों की सुरक्षा और सिंचाई कर रहे हैं।

जनभागीदारी से जल संरचनाओं का जीर्णोद्धार, अब पौधरोपण की तैयारी जनपद सदस्य धर्म सिंह धुर्वे, उपसरपंच रघु परस्ते बताते है कि गांव में चार तालाब, 12 स्टॉप डैम पहले से है। ग्रामीणों की मदद से इनका जीर्णोद्धार कराया है। 4पहाड़ियों मद लगभग साढ़े तीन सौ कंट्रूल ट्रेंच खुदवाए है।

हैंड पंप के पास सोखता पिट और लीज फिट बनवाया गया ताकि निस्तार का पानी सीधे जमीन के नीचे जाए। अब बारिश में पहाड़ियों में भी जनभागीदारी से ही पौधरोपण करवाना है। पौधों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी अब स्वयं हमको उठानी पड़ेगी।

ग्रामीण खुद के खर्चे से बना रहे जल संरचनाएं, टीम कर रही निगरानी अमरपुर जनपद के भाखा मॉल ग्राम पंचायत में लगभग 928 आवास है। 55 ग्रामीणों ने रेन वाटर सोखता गढ्ढा, 262 कंट्रूल ट्रेंच, 8 तालाबों का जीर्णोद्धार, 13 लीज फिट, 7 हितग्राहियों ने ‘एक बगिया मां’ के नाम पर आम नीबू के पौधे लगाकर टपकना, हांडी और स्लाइन बोतल के जरिए पौधों को पानी दे रहे है।

एसिस्टेंट इंजीनियर प्रियंका ने बताया कि शुरुआती दौर में ग्रामीण महिलाएं और पुरुष नहीं समझ रहे थे। चौपाल लगाकर जल के महत्व को समझाया और उसे धरती के नीचे समाहित करने की नसीहत दी। अब धीरे धीरे ग्रामीण अपनी इच्छा से काम कर रहे हैं। भौगोलिक स्थिति ऐसी,वाटर टेबिल कम ,17 प्रतिशत सिंचित रकबा कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया ने बताया कि जिले की भौगोलिक स्थिति ही ऐसी है, लोग पठार और छोटे छोटे टोले में रहते है। जल शक्ति मंत्रालय ने वीडियो कांफ्रेंस की बैठक में मार्च के महीने में जन सहयोग से जल संरचनाओं का निर्माण और जीर्णोद्धार के लिए निर्देशित किया था।

जिले के अधिकारियों की बैठक कर प्लानिंग की। इसके बाद गांव गांव जाकर पानी चौपाल, रात्रि चौपाल लगाकर प्रेरित किया। इस कार्य में सभी विभागों के अधिकारियों-कर्मचारियों का सहयोग मिला है। आंध्र प्रदेश का अल्लूरी सीताराम राजू जिला 6 लाख 89 हजार 113 जल संरचनाएं बनाकर पहले स्थान पर है। जबकि डिंडौरी दूसरे स्थान पर है।

जल संरचनाओं के निर्माण से होगा फायदा, बड़ी संरचना बने तो बेहतर चंद्र विजय कालेज में भूगोल की प्रोफेसर डॉक्टर रश्मि गौतम कहती है कि जिले की भौगोलिक स्थिति पठारी और उबड़ खाबड़ है। पथरीला होने के चलते पानी जमीन के अंदर नहीं जा पाता है।

छोटी छोटी जल संरचनाओं के निर्माण से कुछ फायदा तो होगा। बारिश का पानी सीधे नदी नालों में न जाकर रुक रुक कर जाएगा। हालांकि जिले में बड़ी संरचना बनने पर ही पानी की समस्या से पूर्णत निजात मिल सकेगी।

रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित
अभियान के अंतर्गत पहाड़ी एवं बंजर भूमि पर कंटूर ट्रेंच निर्माण, नदी-नालों में बोरी बंधान, ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर सोखता टैंक तथा शासकीय और अर्धशासकीय भवनों में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम स्थापित किए गए हैं. इन प्रयासों का उद्देश्य वर्षा जल का अधिकतम संचयन कर भविष्य में जल संकट का स्थायी समाधान सुनिश्चित करना है. जलसंचय जनभागीदारी अभियान के तहत जिले में अब तक कुल 5 लाख 52 हजार 638 जल संरचनाओं का निर्माण किया जा चुका है. इनमें 1 लाख 62 हजार 316 कंटूर ट्रेंच, 41 हजार 646 रिचार्ज पिट, 14 हजार 613 रूफटॉप वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम, 9 हजार 941 खेत तालाब, 6 हजार 602 चेक डैम, 3 हजार 441 बोरी बंधान, 8 हजार 746 डगवेल रिचार्ज तथा 35 हजार मटका सिंचाई संरचनाएं शामिल हैं. इस महाअभियान में जनभागीदारी के माध्यम से जल संरक्षण को जनआंदोलन का रूप दिया गया है। 

वर्तमान में पानी की स्थिति कई गांवों में गंभीर जिले के कई ग्रामों से जल संकट की तस्वीरें सामने आ रही है। जिला मुख्यालय में महज तीन किलोमीटर दूर आवास टोला में महिलाओं डेढ़ किलो मीटर दूर घाट उतरकर कुएं से गंदा पानी लाने को मजबूर हैं।

रविवार को बजाग जनपद के करौंदा ग्राम पंचायत के ग्रामीणों ने शहडोल पंडरिया स्टेट हाइवे पानी की समस्या को लेकर जाम कर दिया था। डिंडौरी जनपद के घुसिया ग्राम पंचायत के ढीमरान टोला में पांच सौ की आबादी है। चार साल से नल जल योजना की पाइप लाइन उखड़ी पड़ी है। ग्रामीण लोग कुएं में उतरने को मजबूर हैं।

विभाग ने कंट्रोल रूम बनाया, पानी की व्यवस्था कर रहे पीएचई विभाग के एक्सक्यूटिव इंजीनियर अफजल अमानुल्लाह खान ने बताया कि कलेक्ट्रेट भवन में कंट्रोल रूम बनाया गया है। जहां से भी जल संकट की खबर आ रही है। वहां वैकल्पिक व्यवस्था कराई जा रही है।

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