छुईखदान l रियासतकालीन राधा कृष्ण मंदिर परिसर में श्रीमद्भागवत पुराण कथा जारी है। कथा वाचक पं अश्विनी त्रिपाठी ने बताया कि चाहे वह मनुष्य हो या देवता अथवा कोई भी जीव हो उसे अपने कर्मों का दंड स्वीकारना ही होगा और यदि कोई प्राणी अपने कर्मों के दंड से बचना चाहता है अथवा निवारण चाहता है केवल और केवल प्रभु की शरणागति ही एकमात्र और अंतिम मार्ग है।
इसलिए कम से कम अच्छा, बुरा पाप पुण्य का ज्ञान रखने वाले मानव समाज को दैनिक जीवन में अपने सारे कार्यों में प्रभु का स्मरण, नामजप करते रहना चाहिए। इससे कठिन काम भी सरल हो जाएंगे और प्रभु की कृपापात्र बन जाएगे। जब ऐसा करते-करते भक्त की श्रेणी मे आ जावोगे आपको पता नहीं चलेगा, तब प्रभु आपकी अधीनता स्वीकार लेते हैं क्योंकि स्वयं नारायण ने कहा है कि अह भक्ता पराधीन उक्त उद्गार।
भक्तों के आधीन भगवान नारायण पल में प्रकट हुए: गजेंद्र मोक्ष बलि के उद्धार की कथा कहा कि पूर्वकाल में हूहू नामक गंधर्व अपनी पत्नी के साथ जलक्रीड़ा कर रहे थे और उन्हीं से कुछ दूरी पर ॠषि भी स्नान कर रहे थे। तब मजाक ही मजाक मे गंधर्व ने जल के भीतर ही भीतर जाकर ॠषि के पैर पकड़ लिए और अंततः वे जल में गिर गए, तब ॠषि ने श्राप दिया कि जाओ ग्राह मगर बन जाओ तब से वह ग्राह सभी जीवों पर हमला कर देता था।
एक दिन गजेंद्र स्नान करके प्रभु के लिए कमल पुष्प तोड़कर निकल रहे थे। तब ग्राह ने उन्हें भी जकड़ लिया वे छूटने का प्रयत्न हफ्तों करते रहे और जब अंत में हौसला जवाब देने लगा तब वही कमल आकाश की ओर उछालकर प्रभु को पुकारा। भक्तों के आधीन भगवान नारायण पल में प्रकट हुए। सुदर्शन को आदेश दिया और पल में ही ॠषि के श्राप से गंधर्व भी मुक्त हो गए, गजेंद्र भी मुक्त हो गए। कथा सुनने भक्त पहुंच रहे हैं।
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