राजनांदगांव | जैन बगीचा स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय भवन में अपने नियमित चातुर्मासिक प्रवचन में सोमवार को मुनि श्रेयांशप्रभ सागर महाराज साहब ने कहा कि प्रेम करने वाला व्यक्ति हमेशा आनंदित रहता है, चाहे वह किसी भी परिस्थिति में हो। उसके अनुसार काम हुआ तो ठीक, नहीं हुआ तो भी ठीक, वह हमेशा प्रेम में लीन रहता है। जबकि मोह करने वाला व्यक्ति उसके अनुसार काम नहीं हुआ तो वह क्रोध में आ जाता है।
प्रेम करने वाला व्यक्ति जहां जो हो रहा है उससे सहमत होता है। प्रेम को बांधकर नहीं रखा जा सकता। मोह और राग हमेशा छोटों पर होता है। उन्होंने कहा कि आप जिसकी प्रशंसा कर रहे हैं, उससे मोह टूटने पर आप उसकी बुराई करने लग जाते हैं। यह कभी प्रेम नहीं हो सकता। यह मोह है जिसके कारण आपकी प्रतिक्रिया ऐसी होती है।
मोह टूटने पर वह क्रोध में बदल जाता है जबकि प्रेम नहीं बदलता वह प्रेम ही रहता है। परमात्मा सभी से प्रेम करते हैं। मुनि ने कहा कि परमात्मा का जीवन हमारे लिए एक संदेश है। वे सहज, सरल और दयावान हैं। वे सभी कषायों से दूर हैं। कहा कि हमारे पास कुछ भी नहीं है और जो है उसका हमें अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि परमात्मा की नजरों में वह तुच्छ है।
















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