भोपाल के सरकारी स्कूल की अनोखी पहल, कबाड़ से बन रहे विज्ञान-गणित के मॉडल; बच्चों के लिए पढ़ाई हुई आसान

भोपाल 

पढ़ाई के लिए हमेशा महंगे मॉडल और नई सामग्री की जरूरत नहीं होती। जरूरत है तो सिर्फ नजरिए की। भोपाल के महात्मा गांधी हायर सेकेंडरी संदीपनी स्कूल की शिक्षिका डॉ. अर्चना शुक्ला ने स्कूल में पड़े कबाड़ को ही बच्चों की पढ़ाई का जरिया बना दिया। कहीं टूटी फॉल्स सीलिंग की टाइल्स विज्ञान के मॉडल में बदल गईं तो कहीं पुराने टायर और खाली पड़ी बेंच से गणित का ऐसा मॉडल तैयार हुआ, जो बच्चों के लिए पढ़ाई से ज्यादा खेल बन गया। डॉ. अर्चना शुक्ला को 2026 का राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान भी दिया गया है। उनका मानना है कि जब विद्यार्थी किसी चीज को सिर्फ पढ़ता नहीं, बल्कि उसे बनाता, छूता, रंगता और उसके साथ प्रयोग करता है, तो सीखना उसके लिए बोझ नहीं रहता।

टूटी टाइल्स फेंकी नहीं, विज्ञान की प्रयोगशाला बना दी
बारिश के दौरान एक खाली कक्षा की फॉल्स सीलिंग की टाइल्स टूट गई थीं। ये टाइल्स कबाड़ में रखी थीं। डॉ. अर्चना ने इन्हें फेंकने के बजाय बच्चों की रचनात्मकता से जोड़ दिया। हल्की और बोर्ड जैसी इन टाइल्स पर विद्यार्थियों ने रंगों के जरिए विज्ञान से जुड़े चित्र और मॉडल तैयार किए। इसका मकसद सिर्फ कबाड़ का इस्तेमाल करना नहीं था। बच्चों को परीक्षा में कॉपी पर बनाए जाने वाले चित्रों को रटने के बजाय उन्हें रंगों और रचनात्मक तरीके से तैयार करने का मौका दिया गया। इससे एक तरफ बेकार सामान का इस्तेमाल हुआ और दूसरी तरफ बच्चों की कल्पनाशक्ति भी पढ़ाई से जुड़ गई।

मिट्टी और रंगों से विज्ञान, याद करने का तरीका बदला
डॉ. अर्चना के अनुसार, जब बच्चा क्ले या मिट्टी से किसी वैज्ञानिक संरचना को खुद बनाता है, तो वह सिर्फ उसे देखता नहीं है। उसे छूता है, आकार देता है, रंग चुनता है और अलग-अलग हिस्सों को समझता है। यानी सीखने में कई तरह की संवेदी गतिविधियां एक साथ जुड़ती हैं। यही वजह है कि विज्ञान जैसे विषय को भी कला से जोड़ा जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कला समेकित शिक्षा पर जोर दिए जाने के साथ स्कूल में इस तरीके को प्रयोग के रूप में अपनाया गया है।

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पुराने टायर और बेंच से बना 'गणित का खेल
सबसे दिलचस्प प्रयोग गणित को लेकर किया गया। स्कूल में खाली पड़ी बेंच और बच्चों की ओर से लाए गए पुराने टायरों का इस्तेमाल कर ऐसा मॉडल तैयार किया गया, जिसमें जोड़, घटाव, गुणा और भाग जैसे सवालों को खेल से जोड़ा गया। यह मॉडल स्कूल में बाहर रखा जाता है। सुबह बच्चे आते हैं तो उस पर गणित का सवाल लगा मिलता है। बच्चे उत्सुकता से उसे हल करते हैं और अगली बार के लिए नया सवाल लगा देते हैं। यानी जिस गणित से कई बच्चों को डर लगता है, वही अब उनके लिए रोज का खेल बन गया है।

छोटी कक्षाओं की समस्या खोजकर बड़े बच्चों ने बनाया समाधान
डॉ. अर्चना का तरीका सिर्फ मॉडल बनाने तक सीमित नहीं है। स्कूल में परियोजना आधारित और समस्या आधारित शिक्षण पर भी काम किया जाता है। विद्यार्थियों को कहा जाता है कि वे छोटी कक्षाओं में जाकर देखें कि वहां बच्चों को किस विषय में परेशानी आती है। जब विद्यार्थियों ने पाया कि छोटी कक्षाओं के बच्चों को गणित के सवालों में दिक्कत होती है, तो उन्होंने समस्या का समाधान खोजने की कोशिश की। नतीजा पुराने टायर, खाली बेंच और दूसरे अनुपयोगी सामान से तैयार गणित का मॉडल रहा। यानी यहां बच्चे सिर्फ यह नहीं सीख रहे कि सवाल कैसे हल करना है, बल्कि यह भी सीख रहे हैं कि किसी समस्या का समाधान कैसे खोजा जाता है।

अभाव को बनाया रचनात्मकता का मौका
डॉ. अर्चना शुक्ला कहती हैं कि उनका उद्देश्य यही रहता है कि विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई बोझ न बने और वे चीजों को आसानी से याद कर सकें। उनके मुताबिक स्कूल में संसाधनों की कमी को भी रचनात्मकता में बदला जा सकता है। इसी सोच का नतीजा है कि कबाड़ यहां कचरा नहीं, पढ़ाई की सामग्री है; टायर खेल का हिस्सा नहीं, गणित का मॉडल हैं और टूटी टाइल्स बेकार सामान नहीं, विज्ञान समझाने का माध्यम बन गई हैं।

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