प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और संरक्षण का भाव भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल विचार : उच्च शिक्षा मंत्री परमार

भोपाल
उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इन्दर सिंह परमार ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति संरक्षण के लिए कृतज्ञता के भाव से समाज में ऐसी मान्यताएं स्थापित कीं, जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुरूप हैं। पृथ्वी को माँ मानने की मान्यता हमारे देश की विशिष्ट संस्कृति को दर्शाती है। प्रकृति से उतना ही ग्रहण करना चाहिए, जितना आवश्यक हो। उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के साथ प्रकृति को लौटाने का भाव भी निरंतर बनाए रखना हमारा कर्तव्य है। यही भारतीय दर्शन और विचार का मूल आधार है। संगोष्ठी में विभिन्न विषयविद, विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, शिक्षक, कर्मचारी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

उच्च शिक्षा मंत्री परमार अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल एवं मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद, भोपाल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘पर्यावरण संरक्षण एवं सतत विकास’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के शुभारंभ सत्र को संबोधित कर रहे थे।

उच्च शिक्षा मंत्री परमार ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में विद्यमान मान्यताओं के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को व्यापकता के साथ समाज के सामने लाने की आवश्यकता है। पर्यावरण संरक्षण की भावना केवल विचारों और चर्चाओं तक सीमित न रहे, बल्कि उसे समाज के प्रत्येक व्यक्ति के व्यवहार में उतारना होगा। प्लास्टिक का उपयोग न करने जैसे पर्यावरण-अनुकूल व्यवहारों को जनजीवन का हिस्सा बनाना आवश्यक है। इसके लिए व्यापक जनजागरूकता के साथ व्यक्तिगत आचरण में भी बदलाव लाना होगा।

उच्च शिक्षा मंत्री परमार ने कहा कि विद्यार्थियों में पर्यावरण संरक्षण के संस्कार विकसित करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी शिक्षकों और प्राध्यापकों की है। वे स्वयं अपने आचरण में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और संरक्षण की भावना अपनाएं, ताकि विद्यार्थी भी इन मूल्यों को आत्मसात कर सकें। संपूर्ण समाज को समझना होगा कि भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति और विकास के प्रयासों के कारण वन संपदा नष्ट न हो। विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करते हुए प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व का भाव विकसित करना समय की आवश्यकता है।

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माँ सरस्वती की वंदना और दीप प्रज्ज्वलन से हुआ शुभारंभ
संगोष्ठी का शुभारंभ माँ सरस्वती की वंदना एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. देव आनंद हिंडोलिया ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। कुलसचिव श्रीमती स्वाति वशिष्ठ एवं संगोष्ठी संयोजक डॉ. चित्रलेखा सोनी (कड़ेल) ने अतिथियों का स्वागत किया। विशिष्ट अतिथि डॉ. अनिल कोठारी ने अपने उद्बोधन में पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की महत्ता पर प्रकाश डाला।

तकनीकी सत्रों में पर्यावरणीय चुनौतियों पर विमर्श
संगोष्ठी के प्रथम दिवस दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। प्रो. रविन्द्र कान्हेरे ने बीज वक्तव्य किया। प्रथम तकनीकी सत्र में प्रो. गौतम ने पर्यावरण की वैश्विक दृष्टि पर विचार रखे, जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निदेशक डॉ. विद्यार्थी ने पर्यावरण के समक्ष उपस्थित विभिन्न चुनौतियों पर प्रकाश डाला।

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास तथा प्रकृति के प्रति उत्तरदायी जीवनशैली के महत्व पर विमर्श को प्रोत्साहित करना है। कुलसचिव श्रीमती स्वाति वशिष्ठ ने अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

 

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