भोपाल
उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री इन्दर सिंह परमार ने कहा कि ‘वन्दे मातरम्’ केवल राष्ट्रगीत नहीं, बल्कि राष्ट्रप्रेम, त्याग, समर्पण, स्वाभिमान और राष्ट्रीय एकता की शाश्वत प्रेरणा है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की सिद्धि में युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। राष्ट्रभक्ति, सकारात्मक विचारों और कर्तव्यनिष्ठा से परिपूर्ण युवा शक्ति ही भारत को विकास की नई ऊँचाइयों तक ले जाएगी। मंत्री परमार रविवार को भोपाल स्थित भारतीय वन प्रबंधन संस्थान में केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय के उपक्रम ‘मेरा युवा भारत (माय भारत)’ के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय ‘वन्दे मातरम्’ शिविर के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे। मंत्री परमार ने देश के छह राज्यों से आए युवा प्रतिनिधियों को प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया। उन्होंने युवाओं की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का उत्साहवर्धन किया तथा उपस्थित जनों को नशामुक्ति की शपथ दिलाई।
‘वन्दे मातरम्’ ने जगाया राष्ट्रीय स्वाभिमान
मंत्री परमार ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब देश में निराशा का वातावरण था, तब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वन्दे मातरम्’ ने जनमानस में राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान का भाव जागृत किया। ‘आनंदमठ’ में प्रस्तुत इस गीत ने स्वतंत्रता संग्राम को नई प्रेरणा दी और स्वतंत्रता के बाद इसे राष्ट्रगीत के रूप में आत्मसात किया गया। ‘वन्दे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। असंख्य बलिदानियों के त्याग से प्राप्त स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने तथा उनके सपनों का भारत निर्मित करने में इसकी प्रेरणा महत्वपूर्ण है।
मंत्री परमार ने कहा कि भारत को पुनः विश्व मंच पर अग्रणी बनाने के लिए सामूहिक शक्ति का सृजन और राष्ट्रीय एकात्मता का भाव आवश्यक है। सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ श्रेष्ठ समाज के निर्माण का संकल्प लेना होगा। इस दिशा में शिक्षा के मंदिरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि शिक्षा ही राष्ट्र के विचार, संस्कार और भविष्य को दिशा देती है।
भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित है विश्व कल्याण का मार्ग
मंत्री परमार ने कहा कि ‘विश्व एक परिवार है, बाजार नहीं’ -यह भारतीय दृष्टि हमारे पूर्वजों के ज्ञान में निहित ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत का सार है। कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने वैश्विक सहयोग और मानव कल्याण के माध्यम से इस विचार की प्रासंगिकता प्रदर्शित की। उन्होंने कहा कि ‘धरती हमारी माँ है’ का भाव भारतीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। हमें प्रकृति से उतना ही लेना चाहिए, जितना आवश्यक हो और उसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर योगदान देना चाहिए।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय ज्ञान परंपरा को आत्मसात करने का अवसर
मंत्री परमार ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भारत-केंद्रित, देशानुकूल एवं पंचकोशीय शिक्षा पद्धति को समकालीन शिक्षा व्यवस्था में समाहित करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया है। हमारे पूर्वजों का ज्ञान और व्यावहारिक अनुभव अत्यंत समृद्ध रहा है। शोध एवं अनुसंधान के माध्यम से इस ज्ञान को युगानुकूल संदर्भों में आत्मसात कर भारत को परम वैभव तक पहुँचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
मंत्री परमार ने कहा कि भारत ऊर्जा एवं खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। वर्ष 2047 तक भारत को ऐसा सामर्थ्यवान राष्ट्र बनाना है, जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ विश्व के अन्य देशों की आवश्यकताओं में भी योगदान दे सके। भाषा जोड़ने का माध्यम है, विभाजन का नहीं
मंत्री परमार ने युवा प्रतिनिधियों को बताया कि मध्यप्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में अहिंदी भारतीय भाषाओं को क्रेडिट से जोड़कर पढ़ाने की पहल की जा रही है। उन्होंने कहा कि भाषा जोड़ने का कार्य करती है, तोड़ने का नहीं। भारतीय भाषाएँ हमारी सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्रीय एकात्मता की वाहक हैं। मध्यप्रदेश की धरती से भाषाई एकात्मता का यह संदेश देशभर में प्रसारित होना चाहिए।
मंत्री परमार ने युवाओं का आह्वान किया कि वे राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए अपनी ऊर्जा, प्रतिभा और सामर्थ्य का उपयोग विकसित भारत के निर्माण में करें। सामूहिक संकल्प, भारतीय ज्ञान परंपरा और कर्तव्यनिष्ठा के आधार पर ही वर्ष 2047 के लक्ष्य को साकार किया जा सकता है।
कार्यक्रम में भोपाल लोकसभा क्षेत्र के सांसद आलोक शर्मा एवं नर्मदापुरम–नरसिंहपुर लोकसभा क्षेत्र के सांसद दर्शन सिंह चौधरी ने भी ‘वन्दे मातरम्’ की महत्ता एवं प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किए।
माय भारत के राज्य निदेशक मंगल राम जाखड़, उपनिदेशक सु निक्की राठौर एवं सु मोनिका चौधरी सहित विभिन्न पदाधिकारीगण तथा देश के छह राज्यों से आए युवा प्रतिभागी उपस्थित थे।















Leave a Reply