राज्य की सत्ता से बेदखल होने के बाद भाजपा आलाकमान ने प्रदेश संगठन में अब कसावट लाने की कवायद शुरू कर दी है। प्रदेश भाजपा की टीम तैयार होने के बाद अब अनुषांगिक संगठनों को पटरी पर लाने की तैयारी है। भाजपा के अनुषांगिक संगठनो में युवा मोर्चा की गिनती सबसे पहले होती है। प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने की स्थिति मंे सरकार के कामकाज को लेकर जनता के बीच अच्छी बनाना हो या फिर विपक्ष की राजनीति के दौरान सरकार के खिलाफ माहौल खड़ा करना हो।दोनों ही राजनीतिक परिस्थितियों में मोर्चा की भूमिका अहम रहते आई है। जिले में अपने लोगों को जिलाध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज कराने भाजपाई दिग्गजों की सक्रियता देखते ही बन रही है। सक्रियता इतनी कि पर्दे के पीछे विवाद की स्थिति भी बनती जा रही है। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा में संगठनात्मक बदलाव का बयार चल पड़ा है। प्रदेश भाजपा की टीम तैयार होने के बाद अब मोर्चा व प्रकोष्ठ की टीम तैयार करने रणनीतिकार और प्रमुख नेता लगातार रायशुमारी कर रहे हैं।
आपसी चर्चा और सलाह के इस दौर में दिग्गज मशक्कत करते भी नजर आ रहे हैं। कारण भी साफ है। राज्य की सत्ता से बाहर होने के बाद प्रमुख नेता अपनी पसंद और नापसंद को लेकर ज्यादा ही सतर्क नजर आ रहे हैं। सत्ता से बाहर होते ही संगठन के जरिए जिला व प्रदेश की राजनीति मंे अपना वर्चस्व बनाए रखने कवायद करते दिखाई दे रहे हैं।बिलासपुर जिले की राजनीति पर गौर करें तो राज्य निर्माण के पांच साल को अपवाद स्वस्र्प छोड़ दें तो बीते एक दशक से गुटीय राजनीति के झमेले में जिला फंसा हुआ है। भाजपाई सत्ता और संगठन के दो मजबूत ध्रुव के बीच वर्चस्व की लड़ाई भी देखने को मिली है। खास बात ये कि वर्चस्व स्थापित करने की इस सियासी लड़ाई में सब-कुछ बेहद सामान्य ढंग से होते आया है।
कोई विवाद और ना ही कोई सियासी संघ्ार्ष। खेमेबाजी के इस खेल में शामिल समर्थक और नेता भी इस बात को लेकर लगातार चर्चा करते रहते हैं कि ये कैसी गुटीय लड़ाई है जिसमें सार्वजनिक रूप से कुछ साफ दिखाई नहीं देता पर भीतर ही भीतर सब कुछ असमान्य और बेहद तल्खी।
मोर्चा की राजनीति में दिग्गजों की दिलचस्पी
युवा मोर्चा से लेकर भाजपा के अनुषांगिक संगठनों व मोर्चा प्रकोष्ठ में अपनों को प्रभावी जगह पर बैठाने को लेकर दिग्गज नेताओं की दिलचस्पी भी लगातार बढ़ती जा रही है। युवा मोर्चा जिलाध्यक्ष की कुर्सी को ही ले लें। आधा दर्जन से अधिक दावेदार नजर आ रहे हैं।
पूर्व मंत्री व कद्दावर नेता बृजमोहन अग्रवाल खेमे से निखिल केशरवानी को जिलाध्यक्ष की कुर्सी के लिए मजबूत दावेदार माना जा रहा है। जिले के दिग्गज नेता व पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल खेमे से आदित्य तिवारी व रोहित मिश्रा तो नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक शिविर से रितेश अग्रवाल की गंभीर दावेदारी सामने आ रही है। देखने वाली बात ये है कि जिलाध्यक्ष की कुर्सी पर कौन काबिज होता है और सियासी वर्चस्व की इस लड़ाई में कौन दिग्गज भारी पड़ता है।
