हिंसा,हत्या,हमले का खेल हमेशा नहीं चलता है।एक समय ऐसा आता है कि ऐसी नकारात्मक ताकतों का सफाया हो जाता है। किसी भी तरह की नकारात्मकता से समाज का भला तो होता नहीं है। इसलिए कुछ समय तक ऐसी ताकतों को समाज के एक हिस्से का समर्थन मिलता है, इसके बाद लोग भी समझ जाते हैं कि यह हमारी या क्षेत्र की भलाई के लिए नहीं हैं। इनके होने से तो क्षेत्र का, लोगों का नुकसान हो रहा है तो नकारात्मक ताकतों को समर्थन मिलना पहले कम होता है,उसके बाद एक दिन ऐसा आता है कि समर्थन मिलना पूरी तरह बंद हो जाता है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों के लिए अब ऐसा समय आ रहा है।डरे हुए नक्सलियों का सुरक्षा बलों के टेकलगुड़म कैंप पर हमला इस बात संकेत है।पिछले एक दशक में बस्तर में नक्सलियों का प्रभाव क्षेत्र कम हुआ है।पहले उनका जितने ब़ड़े क्षेत्र में आतंक था,जितने ज्यादा गांवों में आतंक था, अब सुरक्षा बलों के कैप की स्थापना से आतंक का क्षेत्र भी कम हो रहा है और नक्सलियो के आतंक से मुक्त होने वाले गांवों की संख्या भी बढ़ रही है। पहले एक बड़ा इलाका ऐसा था जहां सुरक्षाबल सड़क न होने के कारण पहुंच नहीं पाते थे, अब सड़के बन जाने से सुरक्षा बल नक्सलियोंके प्रभावक्षेत्र तक पहुंच रहे हैं और कैंप की स्थापना पर नक्सलियो के प्रभाव व आतंक को उस क्षेत्र मे कम कर रहे हैं।
इससे वह ग्रामीण जो मजबूरी में नक्सलियों की मदद करते थे, अब सुरक्षा बलों का मौजूदगी के कारण वह खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं और नक्सलियों की मदद भी नहीं करते है। नकसलियों को ग्रामीणों की मदद पहले की तरह नहीं मिल रही है, इस बात का संकेत इससे मिलता है कि पहले नक्सली सुरक्षा बलों के कैप के विरोध के लिए स्थानीय लोगों का इस्तेमाल करते थे अब वह ऐसा नहीं कर पा रहे है और सुरक्षा बल उनके किले समझे जाने वाले इलाकों में पहुंच रहे है और कैंफ भी खोल रहे हैं। पिछले २० दिनों में चार कैंप खुलने से नकस्ली बौखला गए है, अब कैंप का विरोध स्थानीय ग्रामीण नहीं कर रहे हैं, इसलिए नक्सलियों को कैंप पर खुह ही हमला करना पड़ रहा है।
वह जानते हैं कि उनके इलाके में सुरक्षा बलों के कैंप का मतलब है कि उनके अस्तित्व का सवाल पैदा हो जाएगा। उनके इलाके में जगह जगह कैंप का मतलब होगा कि उनकी घेराबंदी हो जाएगी, वह जिस तरह सुरक्षाबलों पर आज घेर कर हमला कर रहे है, एक दिन उसी तरह सुरक्षा बल उनको घेर कर मारेगी और उनके पास बचकर भागने का रास्ता नहीं होगा। सिलगेर,दलेर,टेकलगुड़ आदि ऐसे क्षेत्र हैं जहां पहसे सुरक्षा बल पहुंच नही पाते थे, उन्हें नक्सली हमले का डर रहता था।
आज सुरक्षा बल नक्सलियों को किले समझे जाने वाले क्षेत्र में घुस रहे हैं तथा कैंप खोल रहे हैं। टेकलगुड़ में नया कैंप खुला है। यहां नक्सलियों ने यह सोच कर हमला किया है कि इससे क्षेत्र मे उनका आतंक स्थानीय लोगों में बना रहेगा, सुरक्षा बलों पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा। सरकार भी अपने कदम पीछे करेगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ हैं। सरकार के तेवर तो अब बस्तर से नक्सलियों के सफाए के हैंं। अमित शाह ने अपने पिछले छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान कहा था कि तीन साल में बस्तर से नकसलियों का सफाया हो जाएगा। अमित शाह ने कहा है तो उस पर अमल भी शुरू हो गया है। नक्सलियों के प्रभाव क्षेत्र में लगातार कैपो का खुलना इसी सफाए के अभियान का हिस्सा है।
नक्सली जानते हैं कि कैंपों की संख्या जितनी बढ़ेगी उनकी मुश्किले उतनी बढ़ेंगी तथा उनका सफाया भी होता जाएगा। इसलिए वह कैंपों पर हमले और तेज करेंगे तथा सुरक्षा बलों को बड़ा नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगे।इसिलए सरकार के कैंप खोलने के साथ ही कैंपो की सुरक्षा व्यवस्था को और बेहतर बनाने की जरूरत है। टेकलगुड़ कैंप पर नक्सलियों का हमला तो बड़ा नुकसान पहुंचाने के लिए था, शुक्र है कि बड़ा नुकसान नहीं पहुंचा।२०२१ की तरह वह इस बड़ा नुकसान पहुंचाने मे सफल नहीं हुए तो इसकी वजह है कि उनके प्रभाव क्षेत्र में सुरक्षा बलों की मोजूदगी।
अब सुरक्षा बलो की मोजूदकी के कारण नक्सली खुद हमला करने से बचेंगे क्योंकि सुरक्षा बलों की मोजदूगी के कारण उनकी जान को खतरा बढ़ गया है। वह हमला करेंगे भी तो भागने की जल्दी रहेगी क्योंकि सुरक्षा बलों को मौके पहुंचने पर अब वक्त नही लगेगा।हमले के बाद साय सरकार के सख्त तेवर से नकसलियों को अब समझ मे आ गया होगा कि यह सरकार उकने सफाए के लिेए तत्पर है। उनका सफाया करके ही मानेगी।















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