इंदौर
क्या बिना मिट्टी और बिना खेत के घर के एक छोटे से बंद कमरे में ₹5 लाख किलो वाली कश्मीरी केसर उगाई जा सकती है? देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर के एक किसान ने इस नामुमकिन काम को मुमकिन कर दिखाया है।
इंदौर के रहने वाले अनिल जायसवाल ने अपने घर की दूसरी मंजिल के महज 320 वर्ग फीट के कमरे को हाईटेक कश्मीरी लैब में बदल दिया है। कश्मीरी वादियों जैसा माहौल देने के लिए इस कमरे में इन दिनों केसर के पर्पल फूलों की बहार आई हुई है।
नासा की एयरोपॉनिक्स तकनीक का कमाल
अनिल ने इस खेती के लिए पारंपरिक तरीका छोड़कर नासा द्वारा विकसित 'एयरोपॉनिक्स' तकनीक को अपनाया है। इसमें पौधों को मिट्टी की जरूरत नहीं होती, बल्कि जड़ें हवा में लटकती हैं और उन पर पोषक तत्वों का स्प्रे किया जाता है। कश्मीर के पंपोर से करीब 8 लाख रुपये के बीज लाकर इंदौर के इस बंद कमरे में चिलर और खास लाइटिंग के जरिए कश्मीर जैसा कड़ाके की ठंड वाला तापमान मेंटेन किया गया है।
शुरुआत में लोग इसे पागलपन कह रहे थे क्योंकि एमपी की गर्मी में केसर उगाना मजाक लगता है। लेकिन हमने रिस्क लिया, तापमान और नमी को हर सेकंड मॉनिटर किया। पौधों को लाइव फील देने के लिए हम इन्हें रोज सुबह-शाम गायत्री मंत्र और पक्षियों की चहचहाहट की आवाजें सुनाते हैं, जिससे इनकी ग्रोथ नेचुरल होती है।
अनिल जायसवाल, प्रगतिशील किसान, इंदौर
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केसर प्रोजेक्ट का पूरा गणित
आइडिया की शुरुआत: परिवार के साथ कश्मीर के पंपोर टूर के दौरान केसर के खेत देखकर विचार आया।
शुरुआती सेटअप: 320 वर्ग फीट के कमरे में वर्टिकल रैक, चिलर और स्पेशल ग्रोथ लाइटिंग लगाई गई।
टोटल इन्वेस्टमेंट: इंफ्रास्ट्रक्चर में ₹6.5 लाख और कश्मीर से बीज मंगाने में ₹7 से ₹8 लाख का खर्च आया।
रोजाना की मेहनत: शुरुआत में जायसवाल परिवार रोज 3-4 घंटे देता था, अब सिर्फ 2 घंटे की निगरानी काफी है।
मुनाफे का अनुमान: पिछले साल 3 किलो केसर हुई थी, इस साल करीब 4 किलो उत्पादन की उम्मीद है।
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