चार दशक, अनगिनत बदलाव : ग्रामीण भारत में आईसेक्ट इंडिया की परिवर्तनकारी पहल

भोपाल

 भारत के विकास का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होता है, जब उसके लाभ गांवों, कस्बों और दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचें। शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में भी यही चुनौती लंबे समय तक बनी रही। एक समय ऐसा था, जब कंप्यूटर शिक्षा केवल महानगरों और चुनिंदा संस्थानों तक सीमित थी। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के अधिकांश युवाओं के लिए आधुनिक तकनीकी शिक्षा तक पहुंचना एक कठिन सपना था। ऐसे समय में कुछ लोगों ने केवल परिस्थितियों को स्वीकार नहीं किया, बल्कि उन्हें बदलने का संकल्प लिया।
ऐसे ही दूरदर्शी व्यक्तित्व थे वरिष्ठ शिक्षाविद्, साहित्यकार और चिंतक संतोष चौबे। वर्ष 1985 में उन्होंने ऑल इंडिया सोसाइटी फॉर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कंप्यूटर टेक्नोलॉजी (आईसेक्ट) की स्थापना इस विश्वास के साथ की कि भारत का भविष्य तभी सशक्त होगा, जब शिक्षा, तकनीक और कौशल का लाभ गांवों और समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा। उनके लिए शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भरता, सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र निर्माण का आधार थी। यही सोच आगे चलकर आईसेक्ट की कार्यसंस्कृति, विस्तार और विकास यात्रा की मूल प्रेरणा बनी।

इस सोच को व्यवहार में उतारते हुए वर्ष 1986 में भोपाल में पहला प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया गया। यह केवल एक शिक्षण केंद्र नहीं था, बल्कि ग्रामीण भारत में तकनीकी शिक्षा के लोकतांत्रीकरण की दिशा में उठाया गया एक महत्त्वपूर्ण कदम था। संस्था ने स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें ही प्रशिक्षक बनाया, जिससे शिक्षा के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार, नेतृत्व और आत्मविश्वास के नए अवसर विकसित हुए।

धीरे-धीरे यह प्रयास एक व्यापक सामाजिक पहल में बदलने लगा। आईसेक्ट ने यह सिद्ध किया कि यदि आधुनिक शिक्षा को स्थानीय आवश्यकताओं और समुदाय की भागीदारी से जोड़ा जाए, तो परिवर्तन दूरस्थ क्षेत्रों तक भी पहुंच सकता है।
 
शिक्षा से कौशल, कौशल से आत्मनिर्भरता

वर्ष 1995 आईसेक्ट की विकास यात्रा का महत्त्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुआ। इसी अवधि में संस्था ने अपने कार्यों का विस्तार करते हुए बहुउद्देशीय प्रशिक्षण केंद्र की अवधारणा विकसित की। इन केंद्रों में शिक्षा के साथ कौशल प्रशिक्षण, रोजगार मार्गदर्शन और सामुदायिक विकास की गतिविधियों को एक साथ जोड़ा गया। इससे प्रशिक्षण केंद्र केवल शिक्षण संस्थान नहीं रहे, बल्कि स्थानीय विकास के केंद्र के रूप में विकसित होने लगे।

इसी समय अधिकृत केंद्र मॉडल को अपनाकर स्थानीय उद्यमियों और युवाओं को संस्था के साथ जोड़ा गया। इससे शिक्षा के विस्तार में जनभागीदारी बढ़ी और अनेक क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के नए अवसर भी बने। जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से तकनीकी शिक्षा के प्रति समाज का विश्वास बढ़ा और ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक शिक्षा की स्वीकार्यता मजबूत हुई।

संस्था के बढ़ते कार्यक्षेत्र को अधिक व्यवस्थित स्वरूप देने के उद्देश्य से वर्ष 2003 में आईसेक्ट लिमिटेड की स्थापना की गई। इसके साथ शिक्षा, कौशल विकास और तकनीकी प्रशिक्षण से जुड़े कार्यक्रमों का विस्तार और अधिक संगठित रूप में आगे बढ़ा। यही वह दौर था, जब आईसेक्ट ने प्रशिक्षण संस्था की सीमाओं से आगे बढ़कर शिक्षा, रोजगार और सामाजिक विकास को एक-दूसरे से जोड़ने वाले व्यापक मॉडल के रूप में अपनी पहचान स्थापित की।
 
उच्च शिक्षा, नवाचार और भविष्य की तैयारी

तकनीकी प्रशिक्षण और कौशल विकास के क्षेत्र में मजबूत आधार तैयार करने के बाद आईसेक्ट ने उच्च शिक्षा को भी अपनी विकास यात्रा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनाया। उद्देश्य स्पष्ट था कि महानगरों तक सीमित गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा को राज्यों और क्षेत्रीय स्तर तक पहुंचाना, ताकि विद्यार्थियों को बेहतर अवसर अपने ही क्षेत्र में उपलब्ध हो सकें।

इस दिशा में वर्ष 2005 में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। इसके बाद वर्ष 2010 में भोपाल में रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, 2016 में झारखंड के हजारीबाग में आईसेक्ट विश्वविद्यालय, 2018 में बिहार के वैशाली तथा मध्य प्रदेश के खंडवा में डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई। आगे बढ़ते हुए वर्ष 2023 में भोपाल में स्कोप ग्लोबल स्किल्स विश्वविद्यालय की स्थापना ने कौशल आधारित उच्च शिक्षा को नई दिशा प्रदान की।

इन विश्वविद्यालयों के माध्यम से शिक्षा को केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित न रखकर कौशल विकास, अनुसंधान, नवाचार, उद्योग-शिक्षा समन्वय और रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया गया। बदलते समय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ऐसे शैक्षणिक वातावरण के निर्माण का प्रयास किया गया, जो विद्यार्थियों को ज्ञान के साथ व्यवहारिक दक्षता भी प्रदान कर सके।

इसी अवधि में डिजिटल प्रौद्योगिकी ने देश के सामाजिक और आर्थिक जीवन में व्यापक परिवर्तन किए। शिक्षा और सेवाओं का स्वरूप भी तेजी से बदला। आईसेक्ट ने इस परिवर्तन के साथ कदम मिलाते हुए डिजिटल माध्यमों, तकनीकी प्रशिक्षण और कौशल विकास के जरिए दूरस्थ क्षेत्रों तक आधुनिक सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने का प्रयास किया। इससे अनेक युवाओं को नई तकनीकों के अनुरूप स्वयं को तैयार करने का अवसर मिला।
 
चार दशक, एक सतत संकल्प

चार दशकों की इस यात्रा का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह रहा कि आईसेक्ट ने विकास का केंद्र ग्रामीण भारत को बनाया। जहां अनेक शैक्षणिक पहले बड़े शहरों तक सीमित रहीं, वहीं संस्था ने गांवों, छोटे कस्बों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में शिक्षा और कौशल विकास का आधार तैयार करने का प्रयास किया। स्थानीय युवाओं को अवसर देना, समुदाय की भागीदारी बढ़ाना और शिक्षा को आत्मनिर्भरता से जोड़ना इस यात्रा की प्रमुख विशेषताएं रहीं।

वर्ष 2026 में आईसेक्ट इंडिया के रूप में नई पहचान अपनाना इसी निरंतर विकास का अगला चरण है। यह परिवर्तन केवल नाम का नहीं, बल्कि उस व्यापक दृष्टि का प्रतीक है, जिसके केंद्र में भविष्य उन्मुख शिक्षा, कौशल, नवाचार, अनुसंधान और डिजिटल सशक्तीकरण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का संकल्प है।

आज भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में शिक्षा, कौशल और तकनीक की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है। चार दशकों की यह यात्रा इस विश्वास को सशक्त करती है कि जब शिक्षा समाज की वास्तविक आवश्यकताओं से जुड़ती है, जब अवसर गांवों तक पहुंचते हैं और जब युवा अपनी प्रतिभा को विकसित करने का अवसर पाते हैं, तब परिवर्तन केवल व्यक्तियों के जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के विकास की आधारशिला बन जाता है।
इसी विश्वास के साथ आईसेक्ट इंडिया की चालीस वर्षों की यात्रा आज एक नए पड़ाव पर खड़ी है – जहां अनुभव की समृद्ध विरासत, वर्तमान की आवश्यकताएं और भविष्य की संभावनाएं एक साथ दिखाई देती हैं। यह यात्रा केवल एक संस्था के विकास की कहानी नहीं, बल्कि उस भारत की भी कहानी है, जो शिक्षा, कौशल और नवाचार के सहारे आत्मविश्वास के साथ अपने भविष्य का निर्माण कर रहा है।

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