इंदौर में महिला ने मृत्यु के बाद किया देह दान, 9 महीने पहले पति ने भी किया था देह दान

इंदौर
 मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में वंदना वाधवानी और उनके पति जवाहरलाल वाधवानी ने देहदान कर एक मिसाल कायम की है। वंदना का 17 जनवरी को निधन हुआ, जबकि उनके पति का निधन नौ महीने पहले अप्रैल 2024 में हुआ था। दोनों ने अपनी इच्छानुसार अपनी देह मेडिकल कॉलेज को दान की। वंदना का बेटा कनाडा में रहता है और दुर्घटना में घायल होने के कारण अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सका। उसने वीडियो कॉल के जरिए अंतिम दर्शन किए। इस नेक काम के लिए परिवार की खूब तारीफ हो रही है।

जीते जी भी की दूसरों की मदद

इंदौर की 71 वर्षीय वंदना वाधवानी का 17 जनवरी को आकस्मिक निधन हो गया। उनके परिवार ने उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उनकी देह एमजीएम मेडिकल कॉलेज को दान कर दी। नौ महीने पहले 29 अप्रैल 2024 को उनके पति जवाहरलाल वाधवानी का भी निधन हुआ था और उनकी देह भी दान की गई थी। यह दंपति हमेशा से सामाजिक कार्यों में आगे रहता था और दूसरों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहता था। देहदान उनके परोपकारी स्वभाव का ही एक प्रमाण है।
पति की तरह जाहिर की अंतिम इच्छा

वंदना की भाभी डॉ. मोना देव ने बताया कि वंदना और जवाहरलाल दोनों ही बहुत धार्मिक और समाजसेवी थे। वे हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहते थे। वंदना की भी इच्छा थी कि उनके पति की तरह उनकी देह भी मेडिकल कॉलेज को दान कर दी जाए। इसलिए 18 जनवरी को उनकी देह एमजीएम मेडिकल कॉलेज को दान कर दी गई। उनकी आंखें एमके इंटरनेशनल आई बैंक और त्वचा चोइथराम स्किन बैंक को दान की गई।
मां के अंतिम संस्कार में नहीं आ पाया बेटा

वंदना का बेटा जयेश कनाडा में नौकरी करता है। कुछ दिन पहले एक सड़क दुर्घटना में वह घायल हो गया था। इस वजह से वह अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाया। उसे वीडियो कॉल के जरिए मां के अंतिम दर्शन कराए गए। जयेश और उसकी बहन पुनीता, जो इंदौर में ही रहती हैं, ने अपनी मां की देह दान करने के फैसले का समर्थन किया।
पूरे रीति रिवाज से हुआ अंतिम संस्कार

परिवार ने देहदान से पहले सभी धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन किया। पंडित द्वारा विधि-विधान से अंतिम संस्कार की सभी क्रियाएं पूरी की गईं। मुक्तिधाम की तरह ही सभी रस्में निभाई गईं। चरणों के पास कंडे जलाए गए, परिक्रमा की गई और दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। सोमवार को गीता भवन में उठावना हुआ। अगले हफ्ते बारहवीं की रस्म होगी।
इंदौर के एक और बुजुर्ग ने दान की देह

इसी दिन इंदौर के 91 वर्षीय पुरुषोत्तम बहरानी का भी निधन हो गया। वे कुछ दिनों से बीमार थे। उन्होंने भी पहले ही देहदान का फॉर्म भर रखा था। उनकी इच्छा थी कि उनकी देह मेडिकल छात्रों के अध्ययन के लिए उपयोगी हो। रविवार को उनकी देह भोपाल के मानसरोवर मेडिकल कॉलेज को दान कर दी गई। पुरुषोत्तम की पत्नी का नौ साल पहले निधन हो चुका है। उनकी दो बेटियां हैं। वे सरकारी विभाग में चीफ इंजीनियर के पद से सेवानिवृत्त हुए थे।
क्या होता है देह दान के बाद?

इंदौर जिला अस्पताल के शव परीक्षण केंद्र के प्रभारी डॉ. भरत वाजपेयी ने बताया कि दान की गई देह को मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग में वर्षों तक सुरक्षित रखा जाता है। ज्यादातर गैर-एमएलसी वाली देह ही दान की जाती हैं। देहदान के लिए सीधे संबंधित मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग से संपर्क किया जा सकता है। इसके अलावा कई एनजीओ भी इस काम में मदद करते हैं। देहदान की पूरी प्रक्रिया एसडीएम और तहसीलदार के माध्यम से पूरी होती है। डॉ. वाजपेयी ने कहा कि 'देहदान से बड़ा कोई दान नहीं है। यह एक अमर और सर्वकालिक दान है। देहदाता और उनका परिवार सम्मान के योग्य हैं।'
इंदौर में बना था 58वां ग्रीन कॉरिडोर

इससे पहले इंदौर में एक और मार्मिक घटना में, एक महिला के ब्रेन डेड घोषित होने के बाद उसकी दोनों किडनी और आंखें दान की गईं। इसके लिए इंदौर में दो ग्रीन कॉरिडोर बनाए गए। दोनों किडनी अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती मरीजों को प्रत्यारोपित की गईं। यह इंदौर में बनाया गया 58वां ग्रीन कॉरिडोर था। यह अंगदान बहुत ही भावुक कर देने वाला था। पति-पत्नी भाई दूज के दिन एक दुर्घटना में घायल हो गए थे और अस्पताल में एक-दूसरे के पास ही भर्ती थे। शुक्रवार को पति ने अपनी ब्रेन डेड पत्नी की किडनी और आंखें दान करने की इच्छा जताई। अस्पताल में ही उसकी मांग पर सिंदूर भरकर आखिरी विदाई दी गई। यह दृश्य देखकर सभी की आंखें भर आईं।

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