मध्य प्रदेश तैयार: युद्ध, साइबर अटैक या आपदा में भी नहीं जाएगी बिजली

भोपाल 
बिजली की ग्रिडों पर साइबर अटैक या युद्ध जैसे हालातों में भी मध्य प्रदेश की बिजली गायब नहीं होगी. मध्यप्रदेश के जबलपुर, भोपाल और इंदौर समेत अन्य शहरों में इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग नाम की एक रणनीतिक बिजली व्यवस्था पर काम शुरू हो चुका है. यह सिस्टम ग्रिड से कटते ही शहर को खुद का पावर स्टेशन बना देता है. इसके लिए सबसे पहले जबलपुर को चुना गया है, जहां सेना से जुड़े बड़े रक्षा प्रतिष्ठान मौजूद हैं. इसके बाद भोपाल और इंदौर को भी इसी सुरक्षा कवच से जोड़ा जाएगा. जानें क्या होता है इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग

क्या है इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग?

इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें बिजली सिस्टम के एक हिस्से को जानबूझकर मुख्य ग्रिड से अलग कर दिया जाता है. जब राष्ट्रीय या क्षेत्रीय ग्रिड में कोई बड़ा व्यवधान आता है, तो यह हिस्सा स्वतः आइलैंड मोड में चला जाता है. उस स्थिति में स्थानीय बिजली उत्पादन स्रोतों से शहर की जरूरी सेवाओं को बिजली मिलती रहती है. सरल शब्दों में कहें तो पूरा शहर कुछ समय के लिए खुद का स्वतंत्र पावर ग्रिड बन जाता है.

आइलैंडिंग के लिए जबलपुर क्यों बना पहली पसंद?

जबलपुर देश के रणनीतिक शहरों में शामिल है. यहां आर्मी प्रोडक्शन यूनिट्स, गोला-बारूद निर्माण इकाइयां और रक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण संस्थान मौजूद हैं. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब देश रणनीतिक मोर्चे पर सक्रिय था, उसी समय जबलपुर में इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग परियोजना को स्वीकृति दी गई. इसके जरिए सरकार ने संदेश दिया कि अब युद्ध के हालात और आपातकालीन परिस्थितियों में भी शहर अंधेरे में नहीं डूबना चाहिए.

ऐसे काम करेगा यह सिस्टम

जबलपुर में पहले से एक थर्मल पावर स्टेशन से सीधी ट्रांसमिशन लाइन उपलब्ध है. आपात स्थिति में उस पावर स्टेशन की एक यूनिट सक्रिय की जाएगी और शहर को ग्रिड से अलग कर बिजली सप्लाई दी जाएगी. इस पूरे प्रोजेक्ट पर करीब 7 करोड़ रु खर्च होंगे. इसमें 90 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार वहन कर रही है. फिलहाल टेंडर जारी हो चुके हैं और काम तेजी से चल रहा है. अगले तीन से चार महीनों में यह सिस्टम पूरी तरह तैयार हो जाएगा.

भोपाल और इंदौर में क्या तैयारी?

भोपाल और इंदौर में फिलहाल किसी बिजली उत्पादन केंद्र से सीधी ट्रांसमिशन लाइन नहीं है. इसलिए यहां नजदीकी थर्मल पावर स्टेशनों से समर्पित ट्रांसमिशन लाइनें बिछानी होंगी. दोनों शहरों के लिए प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं. बिजली कंपनी के अधिकारियों का कहना है कि मंजूरी मिलते ही इन महानगरों में भी इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग लागू कर दी जाएगी.

2012 का ब्लैकआउट, जो चेतावनी बन गया

विशेषज्ञ बताते हैं कि जुलाई 2012 में भारत ने अब तक का सबसे बड़ा बिजली संकट देखा. 30 और 31 जुलाई को ग्रिड ओवरलोड के कारण देश के 22 राज्य अंधेरे में डूब गए थे. उसी घटना के बाद यह समझ आया कि केवल एक राष्ट्रीय ग्रिड पर निर्भर रहना, जोखिम भरा हो सकता है. तभी से इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग जैसे विकल्पों पर गंभीरता से काम शुरू हुआ.

इलेक्ट्रिकल ग्रिड क्या होती है?

ग्रिड, जनरेटर और ट्रांसमिशन लाइनों की आपस में जुड़ी प्रणाली होती है. सभी जनरेटर एक साथ काम करते हैं. लेकिन यदि किसी एक हिस्से में बड़ी गड़बड़ी होती है, तो उसका असर पूरी प्रणाली पर पड़ सकता है. यही श्रृंखला प्रभाव पूरे देश में ब्लैकआउट की वजह बनता है.

पावर आइलैंड क्यों हैं जरूरी?

इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग से अस्पताल, रक्षा प्रतिष्ठान, ट्रैफिक सिग्नल, जलापूर्ति और संचार सेवाएं सुरक्षित रहती हैं. यह सिस्टम अपने आप ग्रिड से अलग होकर स्थानीय उत्पादन से बिजली देता है. इसी कारण इसे पावर आइलैंड या वोल्टेज आइलैंड भी कहा जाता है.

शहरों को सुरक्षित रखेंगे पावर आईलैंड

मध्यप्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी के प्रबंध निदेशक सुनील तिवारी ने बताया, '' इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग परियोजना पूरी होने के बाद किसी भी आपात स्थिति में शहर की बिजली आपूर्ति प्रभावित नहीं होगी. जबलपुर में काम तेजी से चल रहा है और तीन से चार महीनों में इसे पूरा कर लिया जाएगा. भोपाल और इंदौर के लिए भी प्रस्ताव भेजे गए हैं. स्वीकृति मिलते ही वहां भी काम शुरू होगा.'' उन्होंने आगे बताया, '' इलेक्ट्रिकल आइलैंडिंग न सिर्फ युद्ध बल्कि साइबर अटैक, तकनीकी खराबी और प्राकृतिक आपदा के समय भी शहरों को सुरक्षित रखेगी.''

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