भोपाल
अब हर विश्वविद्यालय को यूजी-पीजी की तरह पीएचडी कैलेंडर भी अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक करना होगा। इसका उद्देश्य है प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना और छात्रों को समय पर सही जानकारी उपलब्ध कराना। अब तक स्थिति यह थी कि कई विश्वविद्यालय पीएचडी की तारीखें, सीटों की संख्या और पात्रता शर्तें सार्वजनिक नहीं करते थे। कई बार सीटें होते हुए भी यह बताया जाता था कि उम्मीदवार नहीं मिले।
उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने यूजीपीजी की पीएचडी की जानकारी भी वेबसाइट पर अपलोड करने के निर्देश दिए हैं। सूत्रों के अनुसार, कुछ विश्वविद्यालयों में पसंदीदा अभ्यर्थियों के लिए रास्ता आसान करने के आरोप भी लगते रहे हैं। जब प्रवेश प्रक्रिया की स्पष्ट समय-सीमा नहीं होती, तो इंटरव्यू, वेटेज और पात्रता के नियम भी मनमाने ढंग से लागू किए जाते थे। यही कारण है कि कई सरकारी विश्वविद्यालयों में पीएचडी सीटें खाली रह जाती हैं।
कई विषयों में आधी से ज्यादा सीटें खाली
बीयू में करीब 40 विषयों में पीएचडी की कुल 2,379 सीटें हैं। जुलाई में शुरू हुई प्रवेश प्रक्रिया के दौरान केवल नेट स्कोर को पात्र मानने की वजह से कई विषय में आधी से अधिक सीटें खाली रह गईं हैं। इसके लिए बीयू ने नवंबर में एक बार फिर अभ्यर्थियों को मौका दिया, लेकिन एंट्रेंस टेस्ट नहीं लिया। इस बार भी नेट क्वालिफाई को ही मौका दिया गया। स्थिति यह है कि किस विषय में कितनी सीटें खाली हैं स्थिति क्या है। यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।
पीएचडी में नहीं चलेगा AI से कॉपी-पेस्ट!
पीएचडी करने वाले स्टूडेंट्स को जानकारी के लिए बता दें कि बीते दिनों पहले यूनियन ग्रांट कमीशन (UGC) ने कई रिसर्च थीसिस को वापस किया है जिनमें AI से लिखा गया कंटेंट पाया गया। बिहार की एक यूनिवर्सिटी से दर्जनों छात्रों की पीएचडी थीसिस यूजीसी को भेजी थी, जिनमें ये गड़बड़ियां पाईं गई।
यूनिवर्सिटी से भेजी गई रिसर्च थीसिस में यूजीसी के चेक करने पर 40 प्रतिशत से ज्यादा कंटेंट चोरी का पाया गया। यूजीसी ने इसको वापस कर दिया है। बताया गया है कि सबसे ज्यादा इंग्लिश भाषा में सबमिट हुई थीसिस में एआई कंटेंट पाया गया है। हिंदी में जमा की गईं थीसिस में ज्यादा गड़बड़ी नहीं पाई गईं हैं।
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