रसोईयों के आर्थिक शोषण के विरुद्ध मुहिम के चलते बीजाडांडी में हुई सभा

     मंडला
 सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन पकाने वाले रसोइयों की आवश्यक सभा शुक्रवार 17 जनवरी को  बीजाडांडी स्थित मंगल भवन में संपन्न हुई। जिसमें मुख्य रूप से रसोइयों पर बढ़ते जा रहे शोषण के खिलाफ लाम बंद होने की रणनीति पर चर्चा की गई।
       विज्ञप्ति जारी करते हुए रसोईया उत्थान संघ समिति मध्यप्रदेश के संस्थापक पी.डी. खैरवार ने बताया है,कि मध्यान्ह भोजन पकाने के काम में लगी हुई रसोइयों की क्षेत्रीय सभा का दौर विकासखंडवार लगातार जारी है। इसी सिलसिले में बीजाडांडी विकासखंड मुख्यालय स्थित मंदिर परिसर में क्षेत्रीय सभा शुक्रवार को संपन्न हुई।
               सभा में पहुंचे रसोइयों ने अपने भविष्य में गहराते जा रहे आर्थिक संकट से उबरने के लिए उपाय साझा किए।
          रसोईया जयंती अहिरवार ने बताया,कि संगठन के तमाम प्रयासों के बाद भी रसोइयों की छोटी सी छोटी समस्याओं का समाधान भी सरकार समय पर नहीं कर पा रही है।अन्य सरकारी कर्मचारी -अधिकारियों के लिए सातवें से आठवें वेतनमान दिये जाने की नीति बना ली जा रही है,पर हमको नियमित रोजगार के साथ परिवार के भरपेट भोजन के लिए पर्याप्त मानदेय दिये जाने नीति नहीं बनाई जा सक रही है।जिससे रसोइयों के परिवार गरीबी-भुखमरी और कर्ज जैसी गहन पीड़ा में दिन-प्रतिदिन फंसते जा रहे हैं। अब इस तरह से लगातार बढ़ते जा रहे शोषण को खत्म कराने के लिए सरकार की रसोईया विरोधी नीतियों के खिलाफ फिर से लामबंद होना मजबूरी बनती जा रही है।
               बैठक को संबोधित करते हुए प्रदेश संगठन मंत्री कुंवर सिंह मरकाम ने बताया है,कि महज चार हजार रुपए महीने जैसे अत्यंत कम मानदेय दिए जाने के बाद भी सरकार समय पर भुगतान नहीं कर पाती है।जिले के कुछ विकासखंडों में नवंबर से भुगतान नहीं किया गया है।किसी भी छोटे-मोटे कारण का हवाला देकर काम से अलग कर दिये जाने का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है। कुछ स्थानों पर स्कूलों के रेगुलर स्टाफ के द्वारा भोजन पकाने के अलावा अन्य काम दबावपूर्वक लिया जाता है।
गंगोत्री ने बताया,कि रसोइयों के बार-बार ज्ञापन-धरना के बाद भी सरकार नियमित रोजगार देने के लिए कोई नीति बनाने में असफल रही है। जबकि रसोइयों के द्वारा दिन का लगभग पूरा समय यानी साढ़े दस बजे स्कूल खुलने से लेकर लगभग साढ़े चार बजे स्कूल बंद होते तक रसोई की साफ-सफाई से लेकर भोजन पकाने व परोसने वाले बर्तनों की साफ-सफाई कर रसोई में ताला लगाते तक जिम्मेदारी वाले सारे काम करने पड़ते हैं। परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिए अन्य काम करने समय बचा पाने में असमर्थ रहते हैं। इस काम के बदले बड़ी मशक्कत के बाद एक  साल पहले से महज चार हजार प्रति माह या एक सौ तीस रुपए प्रति दिन औसतन पारिश्रमिक दी जा रही है। जो इस कमरतोड़ मंहगाई के चलते परिवार के भरण पोषण के लिए बहुत ही कम पड़ता है। परिवार को पोष्टिक भोजन,मध्यम शिक्षा और मध्यम स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ भी इतनी कम राशी में नहीं दिया जा सकता है।
सावित्री,सोहद्री,मलिया बाई सहित सभी ने कहा,कि महीने के कम से कम बीस हजार रुपए मानदेय जिसमें हर साल एक हजार की बढ़ोतरी,बारह महीने निरंतर काम पर लगाए रखने तथा 62 वर्ष की उम्र तक किसी भी परिस्थिति में काम से अलग नहीं किए जाने जैसी लंबित मांग को पूरा कराने जल्द ही विशाल आंदोलन की रूपरेखा बनाई जा रही है।
    सभा में कुंवर सिंह मरकाम,जयंती अहिरवार, गंगोत्री,मालती,बबीता,तारा ,वर्षा, निम्मा,मैना,सोमवती,देवकी, मंगलों बाई सहित बड़ी संख्या में सामिल हुए।

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