छत्तीसगढ़

आईपीएस अधिकारी की सच्ची कहानी पर आधारित फिल्म ’12th फेल’, जानिए क्या कहते हैं समीक्षक

रायपुर फिल्म समीक्षक राजशेखर चौबे ने हाल ​ही में रिलीज हुए मूवी ’12th फेल’ की समीक्षा की है. उन्होंने कहा कि “तुम झूठ को भी सच की तरह बोलते हो न्यूज़ रिपोर्टर बन जाओ”, भैया कुछ बन जाओ वरना छोड़ कर चली जाएगी वो, लूजर्स के साथ कोई नहीं टिकता भाई” जैसे संवादों से सुसज्जित फिल्म ’12th फेल’ थिएटर में चल रही है. इस फिल्म के निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा से हम सार्थक सिनेमा की उम्मीद करते हैं और वे इस बार भी उम्मीद पर खरे उतरे हैं. मारधाड़ वाली एक्शन फिल्मों के बीच ऐसी फिल्में सुकून देती हैं. समीक्षक ने कहा, फिल्म एक आईपीएस अधिकारी की सच्ची कहानी पर आधारित है. इसमें फिल्म का हीरो मनोज कुमार शर्मा (विक्रांत मैसी) गांव का छात्र है जहां सरे आम चीटिंग होती है. वह 12वीं कक्षा में चीटिंग न कर पाने के कारण फेल हो जाता है. दोबारा बिना चीटिंग किए किसी तरह पास होता है. फिर डीएसपी बनने की चाह लिए गांव से ग्वालियर आता है. कई दुर्घटनाओं के बाद एक दोस्त की मदद से मुखर्जी नगर दिल्ली यूपीएससी की तैयारी के लिए आता है. वहां साफ सफाई ले से लेकर हर तरह के काम करता है. वहीं हीरो है तो हीरोइन की एंट्री भी जरूरी है. हीरोइन श्रद्धा जोशी (मेघा शंकर) पीएससी की तैयारी के लिए दिल्ली आती है और उसकी मुलाकात मनोज से होती है. उन्होंंने कहा कि मेघा शंकर ने श्रद्धा जोशी के रूप में सहज अभिनय किया है. इस बीच फिल्म में कई उतार-चढ़ाव आते हैं. इस प्रेरणादायक कहानी में मनोज ने बिना रुके चार बार रिस्टार्ट किया है. अंत में मनोज आईपीएस के लिए चयनित हो जाता है. इसमें विक्रांत मैसी ने बेहतरीन काम किया है. प्रियांशु चटर्जी ने डीएसपी की भूमिका और अंशुमन पुष्कर ने गुरु की भूमिका के साथ न्याय किया है. डॉ. विकास दिव्यकीर्ति ने अपनी ही यानी शिक्षक की भूमिका बखूबी निभाई है. फिल्म पूरे समय बांधकर रखती है. यह फिल्म नीलोत्पल मृणाल के उपन्यास डार्क हॉर्स व नेटफ्लिक्स की सीरीज एस्पिरेन्ट्स से प्रेरित नजर आती है. उन्होंंने कहा, मगर इस फिल्म में एक बड़ी कमी है. मनोज हिंदी मीडियम का छात्र है फिर भी वह टूरिज्म इन इंडिया के बदले टेरिरिज्म इन इंडिया पर निबंध लिख देता है, जबकि यूपीएससी की परीक्षा 1979 से ही अंग्रेजी के साथ ही हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में दी जा सकती है। ऐसी गलती की प्रत्याशा विधु विनोद जैसे निर्देशकों से नहीं की जाती. यह फिल्म आज के युवा वर्ग खासकर जो प्रतियोगी परीक्षा दे रहे हैं उन्हें अवश्य देखना चाहिए. यह फिल्म उन्हें अवश्य ही प्रेरित और उत्साहित करेगी. वैसे यह साफ सुथरी फिल्म सभी वर्ग के लोगों को पसंद आएगी. मैं इस फिल्म को पांच में से साढ़े चार स्टार दूंगा.

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