यूनियन कार्बाइड परिसर में बनेगा भोपाल गैस मेमोरियल, सरकार ने हाई कोर्ट में दी जानकारी

भोपाल
 दुनिया की सबसे भयावह औद्योगिक दुर्घटनाओं में गिनी जाने वाली भोपाल गैस त्रासदी को चार दशक से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन इस हादसे से जुड़े कई मुद्दे आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। सबसे बड़ा सवाल अब भी यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर में मौजूद जहरीले कचरे और प्रदूषण को लेकर है।

इसी मामले में अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार से फैक्ट्री परिसर की सफाई और पर्यावरण सुधार की पूरी योजना पेश करने को कहा है। अदालत ने पूछा है कि यूनियन कार्बाइड साइट पर मौजूद जहरीले कचरे को हटाने और जमीन-पानी को साफ करने के लिए सरकार ने क्या ठोस कदम उठाए हैं।

बता दें कि भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से दो व तीन दिसंबर 1984 की रात में जहरीली गैस का रिसाव होने से बड़ी त्रासदी हुई थी। मिथाइल आइसोसाइनेट नामक जहरीली गैस के रिसाव से बड़ी संख्या में हुई मौतों के कारण हुई इसे दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक आपदा माना गया। इसका असर आज भी कैंसर, सांस और दिव्यांगता जैसी बीमारियों के रूप में जारी है।

हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक कुमार सिंह और जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की युगलपीठ ने सुनवाई के बाद सरकार को निर्देश दिया कि निर्धारित प्रक्रिया को जारी रखा जाए और कार्ययोजना की विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाए।

जानें कब और किसने दायर की थी याचिका
गौरतलब है कि वर्ष 2004 में आलोक प्रताप सिंह ने यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे के निस्तारण की मांग को लेकर जनहित याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता की मृत्यु के बाद हाईकोर्ट इस मामले की सुनवाई स्वतः संज्ञान याचिका के रूप में कर रहा है। पूर्व में हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश रिपोर्ट में बताया गया था कि न्यायालय के आदेश के अनुसार यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे का निस्तारण पीथमपुर स्थित सुविधा केंद्र में सफलतापूर्वक कर दिया गया है। जहरीले कचरे से करीब 900 मीट्रिक टन राख और अवशेष एकत्रित हुए हैं।

इस बीच हाईकोर्ट में दायर एक अन्य याचिका में कहा गया था कि जहरीले कचरे से निकली राख और अवशेषों में रेडियोएक्टिव तत्व सक्रिय हो सकते हैं, जो चिंता का विषय है। याचिका में यह भी कहा गया था कि राख में मरकरी मौजूद है, जिसे नष्ट करने की तकनीक फिलहाल केवल जापान और जर्मनी के पास है। साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि आबादी वाले क्षेत्र से मात्र 500 मीटर की दूरी पर लैंडफिलिंग की जा रही है।

हाईकोर्ट ने इस याचिका की सुनवाई मुख्य याचिका के साथ करने के निर्देश दिए थे। सुनवाई के दौरान युगलपीठ ने 8 अक्टूबर 2025 को जारी अपने आदेश में आबादी से मात्र 500 मीटर दूर लैंडफिलिंग के लिए तय स्थान पर रोक लगा दी थी। हालांकि बाद में सरकार के आवेदन पर अदालत ने यह आदेश वापस ले लिया था।

पिछली सुनवाई में सरकार ने अदालत को बताया था कि जहरीले कचरे से निकली राख की लैंडफिलिंग का कार्य पूरा कर लिया गया है। शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान भी सरकार की ओर से इसी संबंध में विस्तृत जानकारी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई। 

सरकार ने कोर्ट में पेश की एक्शन टेकन रिपोर्ट
इस मामले में राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के सामने एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) दाखिल की है। रिपोर्ट में बताया गया कि, 3 मार्च को अतिरिक्त मुख्य सचिव अशोक बर्नवाल की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (UCIL) के पुराने प्लांट की स्थिति, वहां मौजूद टॉक्सिक वेस्ट और फैक्ट्री परिसर की सफाई को लेकर विस्तृत चर्चा हुई।

सरकार ने अदालत को बताया कि, इस बैठक में अधिकारियों और विशेषज्ञों ने समयबद्ध रेमेडिएशन (Remediation) यानी प्रदूषित जमीन और पर्यावरण को साफ करने की योजना पर विचार किया। इसका उद्देश्य फैक्ट्री परिसर में मौजूद जहरीले कचरे को सुरक्षित तरीके से हटाना और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करना है।

जहरीले कचरे को हटाने की योजना पर चर्चा
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर में कई जगहों पर अभी भी जहरीला औद्योगिक कचरा और प्रदूषित मिट्टी मौजूद है। यह कचरा लंबे समय से पर्यावरण और आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य के लिए चिंता का कारण बना हुआ है। इसलिए बैठक में यह तय किया गया कि फैक्ट्री परिसर से जहरीले कचरे को हटाने और उसका वैज्ञानिक तरीके से निपटान करने के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध योजना बनाई जाए।

सरकार ने कोर्ट को बताया कि, इस दिशा में संबंधित विभागों के साथ मिलकर काम किया जा रहा है और जल्द ही पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा।

हाईकोर्ट ने मांगी स्पष्ट समयसीमा
हाईकोर्ट ने इस मामले में सरकार से यह भी पूछा है कि, सफाई और पर्यावरण सुधार का काम कब तक पूरा किया जाएगा। अदालत का मानना है कि इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी अगर फैक्ट्री परिसर में जहरीला कचरा मौजूद है तो यह बेहद गंभीर मामला है। कोर्ट ने संकेत दिया कि इस काम को जल्द से जल्द पूरा करना जरूरी है, ताकि आसपास रहने वाले लोगों को किसी तरह का स्वास्थ्य खतरा न रहे।

40 साल बाद भी खत्म नहीं हुआ त्रासदी का असर
दरअसल 2 और 3 दिसंबर 1984 की रात भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कीटनाशक कारखाने से मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) नाम की जहरीली गैस का रिसाव हो गया था। इस गैस के फैलने से हजारों लोगों की तत्काल मौत हो गई थी और लाखों लोग गंभीर रूप से प्रभावित हुए थे। यह हादसा दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदियों में से एक माना जाता है। गैस के प्रभाव से प्रभावित लोगों में कई को आज भी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा फैक्ट्री परिसर में मौजूद रासायनिक कचरे को लेकर भी लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है।

पर्यावरण और भूजल प्रदूषण का खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि, यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर में लंबे समय तक पड़े जहरीले रसायनों के कारण मिट्टी और भूजल प्रदूषण का खतरा बना रहता है। कई रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि अगर इस कचरे का समय पर निपटान नहीं किया गया तो इसका असर आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

इसी वजह से सामाजिक संगठनों और गैस पीड़ितों के समूह लंबे समय से इस साइट की पूरी सफाई और कचरे के सुरक्षित निपटान की मांग करते रहे हैं।

गैस पीड़ितों के संगठन लगातार उठा रहे आवाज
भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के संगठन पिछले कई सालों से सरकार से यह मांग करते आ रहे हैं कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर में मौजूद जहरीले कचरे को जल्द से जल्द हटाया जाए। उनका कहना है कि, जब तक यह कचरा पूरी तरह साफ नहीं होगा, तब तक क्षेत्र के पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर खतरा बना रहेगा। इसी मुद्दे को लेकर समय-समय पर अदालत में भी याचिकाएं दायर की गई हैं।

सरकार का कहना- स्थिति पर लगातार नजर
राज्य सरकार का कहना है कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर की सफाई और पर्यावरण सुधार के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार ने कोर्ट को बताया कि, विशेषज्ञों की सलाह से सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से कचरे का निपटान करने की प्रक्रिया तैयार की जा रही है। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि इस प्रक्रिया के दौरान आसपास के लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो।

कोर्ट की निगरानी में आगे बढ़ेगा काम
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब इस मामले की प्रगति पर अदालत की नजर बनी रहेगी। सरकार को क्लीन-अप प्लान, उसकी समयसीमा और अब तक किए गए काम की पूरी जानकारी अदालत के सामने पेश करनी होगी।

अगली सुनवाई में कोर्ट यह देखेगा कि यूनियन कार्बाइड साइट की सफाई और पर्यावरण सुधार के लिए उठाए गए कदम कितने प्रभावी हैं।

अब तेज होगी सफाई की प्रक्रिया?
भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों और सामाजिक संगठनों को उम्मीद है कि हाईकोर्ट की सख्ती के बाद यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर की सफाई का काम तेज होगा। चार दशक से अधिक समय से लंबित इस मुद्दे के समाधान से न सिर्फ पर्यावरण को राहत मिलेगी, बल्कि प्रभावित लोगों को भी न्याय मिलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।

भोपाल गैस त्रासदी भारत के औद्योगिक इतिहास का एक दर्दनाक अध्याय है। ऐसे में यूनियन कार्बाइड साइट की पूरी सफाई और पर्यावरण सुधार को लेकर उठाया गया हर कदम इस त्रासदी से जुड़े घावों को भरने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

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