राजनांदगांव , खरतरगच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी मसा, खरतर गच्छाधिपति मणिप्रभ सागर के शिष्य मुनि श्रेयांशप्रभ सागर ने कहा कि हम परिवार में रहकर सुखी रहना चाहते हैं किंतु यह खुशियां थोड़ी देर के लिए होती है। हमें खुश रहना है तो हमें संपत्ति नहीं चाहिए बल्कि हमारी बोली में सुधार चाहिए। कहा कि हमारी बोली सुधरी तो मन भी खुश हो जाएगा और काया भी खुश रहेगी।
कहा कि मन-वचन और काया यदि प्रसन्न है तो व्यक्ति का जीवन आनंदित है। कहा कि मन से पाप अधिक होता है किंतु जब तक वचन और काया साथ ना दे तब तक वह पूरा नहीं हो सकता। प्रमुख चीज है बोली या वचन, यदि इसमें सुधार हो तो जीवन आनंदित हो जाता है। वचन हमें डुबाने और तारने का काम करता है। सब शब्दों का खेल है।
गूंगा व्यक्ति किसी को क्रोधित नहीं कर सकता क्योंकि वह नहीं बोलता है। हमारी भाषा हमारे शब्दों के चयन पर ही निर्भर है। मुनि ने कहा कि हमें हर समय प्रसन्न रहना है तो हमारा मन अच्छा होना चाहिए, हमारी बोली अच्छी होनी चाहिए और हमारी काया अच्छी होनी चाहिए और यह सभी संभव है जब हम अपनी बोली को सुधार लें। बोलने के लिए मन का बड़ा रोल होता है किंतु मन को प्रसन्न करना है तो वचन को सुधारना ही होगा।









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