रायपुर । विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में चल रहे सर्वमंगलमय वर्षावास में तप,त्याग,भक्ति और आराधना का क्रम जारी है। बुधवार को धर्मसभा में मुनि संवेगरत्न सागर ने लोभ ध्यान की प्रवचनमाला में जीवन में संयम अपनाने और अनावश्यक इच्छाओं से दूर रहने का संदेश दिया।
मुनिश्री ने कहा कि अहिंसा, संयम और तप ही धर्म हैं। प्रत्येक व्यक्ति को आत्ममंथन करना चाहिए कि उसके जीवन में इनका कितना पालन हो रहा है। जैना मंगल आपके घर का आभूषण हैं और उनका पालन करना परम धर्म है। यदि घर-परिवार में भी इन मर्यादाओं का पालन नहीं होगा, तो मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ना कठिन हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि सुख-सुविधाओं के लिए व्यक्ति संपन्नता हासिल करता है, लेकिन आवश्यकताएं पूरी होने के बाद भी अनावश्यक चीजों की ओर बढ़ती प्रवृत्ति ही लोभ है। विवेकपूर्वक आवश्यकता और अनावश्यकता के बीच अंतर समझकर ही लोभ से बचा जा सकता है।
मुनिश्री ने कहा कि आत्मा की सुरक्षा संयमपूर्ण जीवन में निहित है। जीवन से मर्यादा और संयम का महत्व कम होने पर व्यक्ति सद्गति के मार्ग से दूर हो जाता है। जिनका जीवन निरंतर आत्मकल्याण के केंद्र में रहता है, वे मुनि कहलाते हैं। मुनि श्रावकों को धर्म के प्रति जागरूक रखने और संयम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
मुनिश्री ने कहा कि यदि श्रावक पूर्ण संयममय जीवन का पालन नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्हें कम से कम संयम जीवन की मूलभूत आचार व्यवस्थाओं और मर्यादाओं का पालन अवश्य करना चाहिए।












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