राजनांदगांव : घायल जवानों की जान बचाना ही हमारी प्राथमिकता थी…

राजनांदगांव , देश सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं होता। कारगिल युद्ध के दौरान जब घायल जवान अस्पताल पहुंचते थे, तब हमारी एक ही प्राथमिकता होती थी हर हाल में अपने साथियों की जान बचाना। यह कहना है भारतीय सेना के आर्मी मेडिकल कोर (एएमसी) से सेवानिवृत्त सूबेदार वेंकटरमन साहू का।

उन्होंने कारगिल विजय दिवस की 27 वीं वर्षगांठ पर ‘दैनिक भास्कर’ से विशेष बातचीत में सूबेदार वेंकटरमन साहू ने अपने 30 वर्षों के सैन्य जीवन और 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान के अपने अनुभवों को साझा किया। वेंकटरमन साहू का चयन भर्ती रैली (बीआरओ) के माध्यम से हुआ था। लखनऊ में एक वर्ष की कठिन बेसिक और तकनीकी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद 27 दिसंबर 1994 को वे सेना में शामिल हुए। शुरुआती तीन वर्षों तक पश्चिम बंगाल में सेवा देने के बाद, उनकी तैनाती जम्मू-कश्मीर के सतवारी (जम्मू) स्थित 166 मिलिट्री हॉस्पिटल (166 एमएच) में हुई।

कारगिल युद्ध 1999 में लगातार 12-12 घंटे तक घायलों को संभाला: वर्ष 1999 में जब कारगिल युद्ध छिड़ा, तब साहू सतवारी मिलिट्री हॉस्पिटल में सिपाही पद पर कार्यरत थे। उन्होंने बताया कि युद्ध के दौरान अस्पताल में लगातार घायल जवानों (कैजुअल्टी) को लाया जाता था। एयरपोर्ट या सड़क मार्ग से आने वाले घायलों को तुरंत रिसीव कर एमआई रूम (फर्स्ट एड क्लीनिक) में प्राथमिक उपचार दिया जाता था। उस दौरान समय की कोई पाबंदी नहीं होती थी। 8 से 12 घंटे तक लगातार ड्यूटी चलती थी, जिसमें केवल आधे से एक घंटे का विश्राम मिलता था। सतवारी अस्पताल में प्राथमिक और गंभीर उपचार के बाद बेहद संवेदनशील मामलों को दिल्ली (आर आर अस्पताल व अन्य जगहों में) आगे रेफर किया जाता था।

सिपाही से सूबेदार तक का सफर वर्ष 1994 में बतौर सिपाही सेना में भर्ती हुए वेंकटरमन साहू अपनी पूरी निष्ठा और पदोन्नति के साथ 2024 में सूबेदार के पद से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने बताया कि सेना ने हमें हथियारों से लेकर आपातकालीन चिकित्सा तक की हर ट्रेनिंग दी है। यदि देश को दोबारा हमारी जरूरत पड़ी, तो हम पूर्व सैनिक आज भी सीमा पर जाने के लिए पूरी तरह तत्पर हैं। सूबेदार वर्तमान में इंदिरा नगर में निवासरत हैं।

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