डोंगरगांव , श्रीशांतिनाथ जैन श्वेतांबर मंदिर में मंगलवार को 8:30 से 9:30 बजे तक आयोजित धर्मसभा में विराजित साध्वी आज्ञांजनाश्रीजी मसा ने चातुर्मास के आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक महत्व पर प्रेरणादायी प्रवचन दिया। धर्मसभा में साध्वी आज्ञांजनाश्रीजी मसा ने कहा कि चातुर्मास आत्म परिवर्तन, अहिंसा, तप और मर्यादा का पर्व है। वर्षा ऋतु में असंख्य जीवों की रक्षा के लिए भगवान ने चातुर्मास की व्यवस्था की है।
उन्होंने कहा कि आज करुणा का भाव कम होता जा रहा है, जबकि झूठ, चोरी, परिग्रह और किसी को दुख पहुंचाना भी हिंसा के ही रूप है। यदि जीवन में अहिंसा और धर्म को अपनाया जाए तो जीवन स्वयं मंगलमय बन जाता है। मसा ने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य के भीतर करुणा का भाव क्षीण होता जा रहा है। पड़ोसी के सुख-दुख की चिंता तक नहीं रह गई है।
भगवान महावीर ने संघ, तीर्थ और मर्यादा की स्थापना समस्त समाज के कल्याण के लिए की है। जब मर्यादाओं का उल्लंघन होता है, तब परिस्थितियां विकट बन जाती हैं। साधु-संतों के साथ-साथ श्रावक- श्राविकाओं के लिए भी मर्यादाओं का पालन अनिवार्य है। कहा कि चातुर्मास आत्मशुद्धि, अहिंसा और तप का विशेष काल है। वर्षा ऋतु में असंख्य सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होती है, इसलिए इस समय अहिंसा का पालन सर्वोपरि माना गया है। कहा कि केवल प्राणी की हत्या ही हिंसा नहीं है, बल्कि झूठ बोलकर किसी को दुख पहुंचाना तथा चोरी और परिग्रह की प्रवृत्ति भी हिंसा के ही रूप हैं।
आज भौतिकता के इस युग में ईर्ष्या बढ़ रही है धर्मसभा के दौरान साध्वीश्री ने तप की महिमा बताते हुए कहा कि तप कर्मों की निर्जरा एवं आत्मा को उज्ज्वल बनाने का श्रेष्ठ साधन है। चातुर्मास की व्यवस्था आत्म परिवर्तन के लिए की गई है। दृढ़ संकल्प के साथ जिनवाणी का श्रवण, प्रवचन, पूजा, आराधना एवं छोटे-छोटे तपों से स्वयं को जोड़कर प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बना सकता है। आज भौतिकता के युग में ईर्ष्या बढ़ रही है।
श्रेष्ठ शिक्षाओं को अपने जीवन में आत्मसात करें डोंगरगांव धर्मनगरी है, जहां अनेक दीक्षाएं हुई हैं। दीक्षार्थी बहनों व धर्मनिष्ठ श्रावक-श्राविकाओं के जीवन से प्रेरणा लेकर धर्म की डोर को दृढ़ता से थामना चाहिए। प्रवचन के अंत में मसा ने कहा कि सत्संग मन की शुद्धि, मानसिक शांति, सकारात्मक सोच, विवेक, ज्ञान और ईश्वर से जुड़ने का सर्वोत्तम माध्यम है। गुरु केवल जीवन में आते नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविक शुरुआत ही गुरु के सान्निध्य से होती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को लक्ष्य निर्धारित कर सत्संग से प्राप्त श्रेष्ठ शिक्षाओं को अपने जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लेना चाहिए।






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