डोंगरगांव , शांतिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर में चातुर्मास के तहत आयोजित नियमित प्रातःकालीन धर्मसभा में विराजित साध्वी आज्ञांजना जी मसा ने मंगलवार को कहा कि आज मनुष्य अपने मन के नियंत्रण में जी रहा है, जबकि जीवन का वास्तविक सुख मन पर विजय प्राप्त करने में है। यदि मन को अनुशासित नहीं किया गया तो संकल्प, साधना और पुरुषार्थ सभी कमजोर पड़ जाते हैं।
धर्म ही वह शक्ति है, जो मन को स्थिर कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाती है। जीवन की तुलना एक गाड़ी से करते हुए कहा कि जिस प्रकार कोई चालक बार-बार अपनी मनमर्जी से वाहन चलाए तो उसे बदल दिया जाता है, उसी प्रकार जीवन रूपी गाड़ी के चालक मन को भी अनुशासन में रखना आवश्यक है। मन को नियंत्रित करना सरल नहीं है, लेकिन दृढ़ संकल्प, पुरुषार्थ और नियमित धर्म आराधना के माध्यम से उसे धीरे-धीरे सही दिशा दी जा सकती है। कहा कि आज अधिकांश लोग धन और भौतिक साधनों को ही सुख का आधार मान बैठे हैं, जबकि वे केवल सुविधा के साधन हैं, सुख के नहीं।
साध्वीश्री ने शालीभद्र के पूर्वभव का प्रेरक प्रसंग सुनाया। कहा कि एक निर्धन बालक ने अपनी भूख से अधिक महत्व गुरु भगवंत को आहार अर्पित करने को दिया। उसी निष्काम पुण्य का परिणाम था कि अगले जन्म में उसका जन्म समृद्ध परिवार में शालीभद्र के रूप में हुआ। इस प्रसंग के माध्यम से मसा ने समझाया कि धर्मभाव से किया गया छोटा-सा पुण्यकर्म भी जीवन और भव दोनों को बदलने की क्षमता रखता है।
धर्म की शक्ति ही जीवन को भीतर से समृद्ध बनाती है सच्चा सुख धर्म, संयम और सदाचार से प्राप्त होता है। जो व्यक्ति धर्म का आश्रय लेता है, उसके जीवन में मान-सम्मान, संतोष और पुण्योदय स्वतः जुड़ते चले जाते हैं। धर्म की शक्ति ही मनुष्य के जीवन को भीतर से समृद्ध बनाती है। मसा ने कहा कि छोटे-छोटे सत्कर्म भी महान पुण्य का कारण बनते हैं। पक्षियों को दाना डालना, निरीह जीवों की सेवा करना और निस्वार्थ भाव से किए गए कार्य तत्काल भले ही फल न दें। वे आत्मा को शांति और भविष्य के लिए पुण्य का संचय अवश्य प्रदान करते हैं।









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